Spread the love

सुरेंद्र अग्निहोत्री

लखनऊ, 26 अक्टूबर, 2026
उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने आज जन भवन परिसर में अपनी प्रेरणा एवं परिकल्पना से विकसित ‘गंगासागर नमो नमः’ स्थल पर गंगा आरती की। इस अवसर पर जन भवन में कार्यरत अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने अपने परिवारजनों के साथ सहभागिता कर मां गंगा के प्रति श्रद्धा एवं आस्था व्यक्त की। शरद पूर्णिमा के उपलक्ष्य में श्रद्धालुजनों ने चांदनी रात में पारंपरिक गरबा नृत्य कर पर्व को उल्लासपूर्वक मनाया।
‘गंगासागर नमो नमः’ परियोजना गंगोत्री से गंगासागर तक मां गंगा की आध्यात्मिक यात्रा को एक ही परिसर में साकार करती है। यह परियोजना भारतीय तीर्थ परंपरा, सांस्कृतिक विरासत, प्रकृति के प्रति सम्मान तथा मां गंगा की निर्मलता और अविरलता के संदेश को समर्पित है। यहां आयोजित गंगा आरती श्रद्धालुओं को मां गंगा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर प्रदान करती है।
विदित है कि जन भवन परिसर में 17 सितंबर को ‘गंगासागर नमो नमः’ स्थल का उद्घाटन किया गया था। यहां प्रतिदिन सायंकाल गंगा आरती का आयोजन किया जाएगा। गंगा आरती भारतीय सनातन परंपरा में श्रद्धा, समर्पण और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। दीपों की ज्योति, मंत्रोच्चार और सामूहिक प्रार्थना के माध्यम से मां गंगा की आराधना की जाती है। यह परंपरा नदियों के आध्यात्मिक महत्त्व के साथ-साथ उनके संरक्षण, स्वच्छता और अविरलता के प्रति जागरूकता का संदेश भी देती है।
दशहरा के पश्चात शरद ऋतु के आगमन के समय गंगा आरती का आयोजन धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है। शारदीय नवरात्र और दशहरा के बाद आने वाला यह ऋतु परिवर्तन भारतीय परंपरा में आध्यात्मिक साधना, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सकारात्मकता से जुड़ा है।
भारतीय पंचांग में आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के रूप में विशेष महत्त्व प्राप्त है। वर्षा ऋतु के बाद निर्मल आकाश, चंद्रमा की उज्ज्वल चांदनी और शरद ऋतु की सौम्यता इस पर्व को विशिष्ट बनाती है। इसे रास पूर्णिमा, कौमुदी महोत्सव तथा विभिन्न क्षेत्रों में कोजागरी पूर्णिमा जैसे नामों से भी जाना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की चांदनी को अमृततुल्य और कल्याणकारी माना जाता है। इस अवसर पर अनेक परिवार खीर बनाकर चांदनी में रखते हैं और बाद में उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। यह परंपरा चंद्रमा के प्रति श्रद्धा और भारतीय लोकजीवन के प्रकृति से गहरे संबंध को दर्शाती है। शरद पूर्णिमा और गंगा आरती, दोनों ही प्रकृति के प्रति सम्मान, पवित्रता और जीवन के प्रति कृतज्ञता की भावना को अभिव्यक्त करते हैं।
उत्तर प्रदेश के मथुरा, वृंदावन और संपूर्ण ब्रज क्षेत्र में शरद पूर्णिमा का विशेष आध्यात्मिक महत्त्व है। वैष्णव भक्ति परंपरा और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह रात्रि भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य महारास लीला से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि वृंदावन में चंद्रमा की उज्ज्वल चांदनी के बीच भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीराधा और गोपियों के साथ महारास किया था। यह लीला प्रेम, भक्ति और परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक मानी जाती है।
ब्रज की प्रचलित मान्यता के अनुसार, भगवान शिव भी महारास के दर्शन की अभिलाषा से वृंदावन पहुंचे थे। रास में प्रवेश के लिए उन्होंने गोपी स्वरूप धारण किया और इसी प्रसंग से गोपेश्वर महादेव की परंपरा जुड़ी हुई है। वृंदावन स्थित गोपेश्वर महादेव मंदिर इस धार्मिक मान्यता का प्रमुख केंद्र है। ब्रज में शरद पूर्णिमा के अवसर पर रासलीला, भजन-कीर्तन और राधा-कृष्ण की आराधना के माध्यम से भक्तिमय वातावरण निर्मित होता है।
गुजरात में शरद पूर्णिमा को ‘शरद पूनम’ कहा जाता है। इस अवसर पर चंद्रमा की पूजा, भजन-कीर्तन, पारंपरिक प्रसाद और सांस्कृतिक आयोजनों की परंपरा अनेक स्थानों पर प्रचलित है। गरबा गुजरात की प्रमुख लोक एवं भक्ति परंपराओं में से एक है। संगीत की लय, गोलाकार नृत्य और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से यह उत्सव आस्था, आनंद और सामाजिक एकता का संदेश देता है।
गरबा का आयोजन प्रायः रात्रि में किया जाता है। विशेष रूप से शरद ऋतु की सुहावनी रातों में खुले वातावरण और चंद्रमा की सौम्य आभा के बीच नृत्य करने का अपना सांस्कृतिक आकर्षण है। हालांकि, गरबा केवल चांदनी रात तक सीमित नहीं है; नवरात्रि के दौरान भी इसे व्यापक रूप से आयोजित किया जाता है।
पारंपरिक गरबा में छिद्रयुक्त मिट्टी के घड़े के भीतर दीपक रखा जाता है, जिसे ‘गर्भदीप’ कहा जाता है। यह दीपक जीवन, ज्ञान और देवी शक्ति की ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। उसके चारों ओर गोलाकार नृत्य जीवन और सृष्टि के निरंतर चक्र तथा केंद्र में विद्यमान दिव्य ऊर्जा का सांकेतिक रूप प्रस्तुत करता है। इस प्रकार गरबा धार्मिक आस्था के साथ गुजरात की समृद्ध लोक-संस्कृति और सामूहिक उल्लास का भी प्रतीक है।
गरबा केवल पारंपरिक नृत्य ही नहीं, बल्कि आनंद के साथ शारीरिक सक्रियता का भी माध्यम है। इसकी लयबद्ध पदचाल, तालियां और हाथों की गतियां शरीर के विभिन्न अंगों को सक्रिय करती हैं। नियमित रूप से अपनी क्षमता के अनुसार नृत्य करने से शारीरिक फिटनेस, हृदय एवं श्वसन संबंधी सहनशक्ति, संतुलन और समन्वय को बेहतर बनाने में सहायता मिल सकती है।
भारत के विभिन्न राज्यों में शरद पूर्णिमा स्थानीय आस्थाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुरूप अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है।
महाराष्ट्र में इसे ‘कोजागिरी पूर्णिमा’ कहा जाता है। इस अवसर पर रात्रि जागरण, मां लक्ष्मी की आराधना और दूध अथवा मसाला दूध ग्रहण करने की परंपरा प्रचलित है। लोकमान्यता में इस रात्रि को जागरण और समृद्धि की कामना से जोड़ा जाता है।
पश्चिम बंगाल में ‘कोजागरी लक्ष्मी पूजा’ के माध्यम से मां लक्ष्मी की आराधना की जाती है। परिवार सुख-समृद्धि और मंगलकामना के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। ओडिशा में यह पर्व ‘कुमार पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर विशेष रूप से युवतियां चंद्रमा की पूजा कर सुख, सौभाग्य और मंगलमय भविष्य की कामना करती हैं।
मध्य प्रदेश के सागर में कोजागिरी महोत्सव के अंतर्गत लाखा बंजारा झील के तट पर महाआरती, दीपदान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन की परंपरा है। देश के विभिन्न अन्य क्षेत्रों में भी श्रद्धालु चंद्रमा की आराधना करते हैं, पारंपरिक व्यंजन बनाते हैं और परिवार तथा समुदाय के साथ पर्व मनाते हैं।
शरद पूर्णिमा की ये विविध परंपराएं भारत की सांस्कृतिक बहुलता, प्रकृति के प्रति सम्मान, पारिवारिक आत्मीयता और सामुदायिक सहभागिता को अभिव्यक्त करती हैं। जन भवन में इस अवसर पर आयोजित गंगा आरती और चांदनी रात में गरबा भारतीय आध्यात्मिक विरासत तथा लोक-संस्कृति के इसी समन्वित स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं।
इस अवसर पर विशेष कार्याधिकारी श्री राज्यपाल अपर मुख्य सचिव स्तर डॉ0 सुधीर महादेव बोबडे व जन भवन के समस्त कार्मिकगण उपस्थित रहे।

——

You may be interested

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!