जिगर के हर हालात में होम्योपैथी का साथ

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डा उपेन्द्र मणि त्रिपाठी

हमारे शरीर में पायी जाने वाली सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण ग्रंथि है लिवर जिसे हिंदी में यकृत या जिगर भी कहते हैं।यकृत पेट के ऊपरी दायीं तरफ पसलियों के नीचे वाले हिस्से में स्थित होता है जिसका वजन लगभग 1450 ग्राम होता है और यह बड़े दायें और छोटे बाएं भाग में बंटा होता है। इसीके नीचे पित्ताशय पाया जाता है, जिसमे वसा को पचाने में सहायक रस बाइल को एकत्र किया जाता है। कार्य के महत्व की दृष्टि से संक्षेप में कहा जाये तो यकृत शरीर में  रेसेप्सनिस्ट और मैनेजर दोनों की भूमिका अदा करता है। क्योंकि यह शरीर में बाहर से आने वाले सभी खाद्य अखाद्य पदार्थों तत्वों के पाचन, उनके अवशोषण, उचित अनुपात में  विभाजन व यथास्थान संचयन, संप्रेषण, अथवा उत्सर्जन को सुनिश्चित करता है। इसीलिए पोषक तत्व हों, औषधि हो या विष सभी सबसे पहले लिवर को प्रभावित करते हैं, अत्यधिक कार्य एवं उपयोगिता के कारण ही लिवर में प्राकृतिक पुनर्निर्माण की क्षमता भी अन्य अंगो से अधिक पायी जाती है। कह सकते हैं कि शरीर के भीतर भरण पोषण की जिम्मेदारी लिवर की ही होती है जिससे अन्य अंगतंत्र व्यवस्थित कार्य कर पाते हैं इसलिए यदि किन्ही कारणों से लिवर की सामान्य क्रिया बाधित होती है तो यह अनेक तंत्रो की कार्यक्षमता पर भी असर डालता  है जिससे व्यक्ति शारीरिक मानसिक रूप से रोगग्रस्त हो जाता है।

चिकित्सकीय दृष्टि से यकृत को प्रभावित कर सकने वाले प्रमुख कारकों में व्यक्ति का आनुवंशिक कारक, कोई वाह्य विषाक्तता ; जीवाणु, विषाणु, परजीवी, संक्रमण, अथवा व्यक्ति की लंबी बीमारी व अत्यधिक दवाओं का अनावश्यक सेवन, अनियमित, असन्तुलित जीवन शैली, व तमाम मानसिक स्थितियां हैं जो लिवर को कई तरह से प्रभावित कर सकते हैं।

यकृत सम्बन्धी रोग की पहचान के लिए संकेत –

पेट के ऊपरी, पसलियों के नीचे दाहिने भाग में दर्द होना।

पाचन से संबंधित समस्याएं जैसे अपचन और एसिडिटी के कारण जी मिचलाना या उल्टियां होना। 

भूख कम लगना और वज़न कम होते जाना।

मल त्याग में  परिवर्तन जैसे कब्ज़, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम या भोजन के तुरन्त बाद मलत्याग की हाजत,  मल के रंग में परिवर्तन, काले रंग का मल या मल में रक्त आना।

रक्त में बिलीरूबिन से व्युत्प्नन यूरोबिलिनोजेन का स्तर बढ़ जाने के कारण मूत्र का गहरा पीला हो जाना

त्वचा तथा आँखों का सफ़ेद और पीला होना

त्वचा की सतह पर पाए जाने वाले द्रव्य में कमी से त्वचा का सूखी, मोटी, छिलकेदार होना तथा उसपर खुजली वाले चकत्ते, या लिवर स्पॉट अर्थात हल्के रंग के धब्बे होना । 

शरीर के भिन्न हिस्सों जैसे पैरों, टखनों और त्वचा के नीचे दबने वाली सूजन, जिसे एडिमा कहते हैं।
   
पुराने मामलों में थकान ,चक्कर आना, मांसपेशियों की तथा दिमागी कमज़ोरी, याददाश्त कम होना तथा संभ्रम (कन्फ्यूज़न) होना तथा अंत में कोमा जैसी अवस्था।  

पेट पर सूजन ; सामान्यतः यह अवस्था लिवर सिरोसिस नामक गंभीर बीमारी में देखने को मिलती है जिसे असाइट्स या पेट में पानी आ जाना भी कहते हैं।

यकृत सम्बन्धी होने वाले प्रमुख रोग-

पीलिया

रक्त में पित्त वर्णक या बाइल की मात्रा सामान्य से अधिक होने पर यह त्वचा के नीचे, आँखों के सफेद हिस्से स्क्लेरा, या म्युकस मेम्ब्रेन में जमा होने लगता है, जिससे रोगी पीला सा दिखता है। यह स्थितिअत्यधिक रक्त कोशिकाओं के टूटने, लिवर कोशिकाओं के विकार, या बाइल ले जाने वाली नलिका में अवरोध के कारण उत्पन्न हो सकती है।

लिवर में सूजन या हेपेटाइटिस

सामान्यतः संक्रमित व्यक्ति या खुले में मलत्याग के जरिये संभावित विषाणु के संक्रमण से लिवर कोशिकाओं में सूजन आ जाती है, जिससे लिवर का आकार बढ़ जाता है,  व्यक्ति में पीलिया,व भूख में कमी भी मिलती है।

लिवर सिरोसिस

आनुवंशिक कारणों , असन्तुलित जीवन भोजन शैली, अल्कोहल या अन्य कारणों से लिवर की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं जिससे पहले उनमे सूजन के कारण कुछ आकर बढ़ता है किन्तु रोगप्रगति के साथ फाइब्रोसिस होने से छोटी बड़ी गांठे बनने लगती हैं जिससे लिवर का आकार सिकुड़ जाता है। अनुपचारित मामलो में द्वितीयक संक्रमण या कैंसर आदि लक्षण उतपन्न हो सकते हैं।

लिवर फेल्योर या हिपेटिक कोमा

यह एक प्रकार की मानसिक और तंत्रिकीय विकार जनित अवस्था है जिसमे लिवर कोशिकाएं कार्य करना बन्द कर देती हैं।

लिवर में ट्यूमर या कैंसर

अनुमानित तौर भारत में दस फीसद मौत का कारणों में इस प्रकार के कैंसर की हिस्सेदारी भी है । किसी पुरानी अनुपचारित बीमारी, संक्रमण या अज्ञात कारणों से लिवर में गांठ बन सकती है या अनियंत्रित बृद्धि कैंसर का रूप ले सकती है।

लिवर में फोड़ा

टायफायड, दूषित जल, पथरी, बवासीर, संक्रमित एपेंडिसाइटिस आदि के जरिये संक्रमण लिवर कोशिकाओं तक पहुँच कर यहां फोड़ा बना सकता है, जिसमे पस बनती है।
अमीबिक कोलाइटिस के कारण भी बाद में फोड़ा बनने की सम्भावना रहती है।

प्रमुख जांचें एवं पुष्टि

लिवर फंक्शन टेस्ट
यह ब्लड एवं सेरोलॉजिकल टेस्ट से बहुत सी जानकारियां जैसे  हेपेटाइटिस विषाणु, एंजाइम, पीत वर्णक या बाइल, आदि की जानकारी मिल जाती है।
रेडियोलॉजिकल जाँच में एक्सरे, अल्ट्रा साउंड, पी टी सी, सी टी स्केन।
लिवर बायप्सि आदि से प्राप्त रिपोर्ट एवं लक्षणों के मिलान के आधार पर बीमारी की पुष्टि एवं उपचार के लिये उचित पथ्य चयन में सहायता मिलती है।

बचाव एवं उपचार के उपाय ; होम्योपैथी

संतुलित आहार, नियमित जीवन शैली योग व्यायाम और होम्योपैथी  अपनाकर अपने लिवर में सम्भावित रोगों से बचा जा सकता है या बेहतर इलाज से रोगमुक्त हो सकते हैं।

भारतीय मनीषियों ने बताया है कि हमारी जीवनी शक्ति जैविक घड़ी के अनुसार अंगतंत्रो में अलग अलग समय में अधिक सक्रिय होती है , अतः दिनचर्या को प्रकृति के अनुरूप ही ढलने का प्रयास करें। रात्रि में 12 से 2 बजे तक यही जीवनी शक्ति शरीर में नवीन कोशिकाओं के निर्माण व रिजनेरेशन में अधिक सक्रिय होती है इसलिए समयानुसार कम से कम 6 घंटे की नींद अवश्य पूरी करें और अवश्य लें।

जितना हो सके तनावमुक्त रहें क्योंकि इसका सीधा प्रभाव लिवर की कार्य क्षमता व पाचन प्रक्रिया पर होता है।

खान पान में सावधानी सबसे महत्वपूर्ण है , पर्याप्त मात्रा में ताजे मौसमी  फल और हरी पत्तेदार सब्जियां, या उनका जूस, मट्ठा, स्वच्छ या उबला हुआ पानी अवश्य लें।
भूख लगने पर ही किन्तु भूख से थोडा कम भोजन करें।

सुबह खाली पेट एक बड़ा गिलास गुनगुना नींबू पानी पिएं।
खाना बनाने में चुटकी भर हल्दी का इस्तेमाल भी फायदेमंद है।
रोज 6-7 लहसुन की कलियां लें यह लीवर को साफ करता है।
शराब , सिगरेट, अत्यधिक  वसीय , तैलीय , ट्रांस फैट, घी, तले हुए भोजन से बचने की कोशिश करें।

इतना शारीरिक श्रम या दौड़ भाग, साइकलिंग, खेल या व्यायाम अवश्य करें कि पसीना निकले।
इसके अतिरिक्त प्राणायाम, अर्धमत्स्येंद्रासन, मलासन, अधोमुख आसन को भी अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए।

होम्योपैथी

एक तरफ जहां प्रचलित आधुनिक चिकित्सा पद्धति में रोग की पहचान एवं पुष्टि प्रयोगशाला की जाँच पर आधारित और सीमित सम्भावनाओं वाली है, वहीं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों में रोगों के उपचार में व्यक्ति को समग्र रूप से स्वस्थ करने की क्षमता है, इस क्षेत्र में होम्योपैथी सर्वोपरि है। इसमें व्यक्ति में रोग नही अपितु रोग में व्यक्ति का इलाज उसकी समलक्षणिक औषधि चयन के तरीके को अपना कर किया जाता है। इसलिए व्यक्ति दर व्यक्ति औषधियों में भिन्नता भी पायी जाती है जिसे वैयक्तिक या कांस्टिट्यूशनल औषधि चयन भी कहते हैं। यह स्वयं में बड़ी जटिल मनोवैज्ञानिक चिकित्सकीय प्रणाली है कहीं भी पढ़ सुन या देखकर नहीं अपनाया जा सकता। कुछ महत्वपूर्ण औषधीयां जिन्हें ऑर्गेनो स्पेसिफिक भी कहते हैं त्वरित लाभ की दृष्टि से व्यवहृत होती हैं। उपचार की दृष्टि से आर्सेनिक, ब्रायोनिया, लाइको, नक्स, चायना, कैर्दुअस, चेलिडोनियम, नेट्रम सल्फ, सल्फर, पोडोफाइलम, एन्ड्रोग्राफिस , हाईड्रैस्टिस, फिलेंथस, मायरिका, कैरिका पपाया, नेट्रम मयूर, सीपिया, पल्स, आदि औषधियों की उपयोगिता है।

केस-भरण पोषण का तनाव और लिवर

लगभग दो वर्ष पूर्व  एक  महिला उम्र लगभग 40 वर्ष , को चिकित्सकों ने लिवर कैंसर या सिरोसिस की द्वितीय अवस्था की सम्भावना बताते हुए इलाज की सलाह दी थी,किन्तु आर्थिक कारणों से वह मंहगे इलाज के लिए तैयार न थी। बेहद कमजोरी  के कारण दो यूनिट खून चढ़ाया जा चुका था,  हमारे चिकित्सक मित्र की सलाह पर मुझे होम्योपैथी के लिए बुलाया गया। रिपोर्ट्स देखने से पता चला लिवर के अधिकांश हिस्से में छोटी छोटी नोड्यूल्स थीं। महिला दुर्बल शरीर की कमजोर और बेहद उदास नजर आ रही थी, कुछ बातचीत के बाद उन्होंने बताया कि भूख नही लगती, कुछ खाती हैं तो उल्टी हो जाती है, या पेट तन जाता है, गैस बनती है, ज्यादातर कब्ज  कभी कभी दस्त आते हैं, बायीं तरफ भी दर्द होता है।मैंने उनके परिवार व पहले हुयी किसी बीमारी के बारे में पूछा तो उन्होंने बहुत सी बाते बतायीं जो दैनिक जीवन में सामान्य सी ही कही जा सकती हैं किन्तु एक महत्वपूर्ण बात जो मुझे लगी वह ये कि  “सर हमे अपनी चिंता नहीं, लेकिन बच्चों की देखभाल कौन करेगा, पति 6 साल पहले ही घर छोड़ कर चले गए, सास ससुर भी हमे दोषी मानकर साथ नही रहते, हालात यह हैं कि हमारे सामने बच्चों के पालन पोषण की चिंता बनी रहती है, इन्ही बच्चों के लिए जीना पड़ता है, सब हमे ही करना है, कोई न होता तो कोई बात न थी, जब तक बस चलता है काम से पीछे नहीं हटती, ।” इस दौरान वह कई बार रोई भी।
लक्षणों की समग्रता के आधार पर सीपिया 10 M की एक खुराक व कॉर्दूअस 6 की दिन में तीन खुराक 2 सप्ताह के लिए दी गयी। 20 दिन बाद मुझे स्वास्थ्य में सुधर की सूचना दी गयी । हमने कारडुआस को 15 दिन तक 2 बार नियमित करने की सलाह दी । इसके बाद लगभग 3 माह तक मेरे पास कोई सूचना नही आई किन्तु जिज्ञासा बनी रहती।फिर एक दिन हमारे चिकित्सक मित्र के साथ महिला के एक रिश्तेदार मिलने आये और उन्होंने बताया अब वह पहले की तरह स्वस्थ है कोई तकलीफ नहीं है। हमारे लिए भी यह सुखद अनुभूति थी।मैंने होम्योपैथी पर विश्वास करने के लिए उनका और मेरे सेवाकार्य को सफल करने के लिए ईश्वर का आभार व्यक्त किया।
इस केस को पूरा समझने के प्रयास में मैंने आकलन का जो तार्किक आधार माना वह था कि, पति के घर छोड़ जाने के बाद परिवार एवं बच्चों के भरण पोषण की चिंता महत्वपूर्ण कारण है जिससे उक्त महिला निरन्तर उदास रहती , और सम्भवतः इसी तरह धीरे धीरे स्वास्थ्य की समस्याओं में निरन्तरता ने शरीर का भरण पोषण की व्यवस्था करने वाले अंग का चयन किया होगा, और जीवन की कुंठाएं गांठ की तरह प्रस्तुत हुई होंगी।
यद्यपि ऐसे किसी सिद्धांत का जिक्र चिकित्सा विज्ञान में पढ़ने को नही मिलता किन्तु विज्ञान के साथ दर्शन आध्यत्म और मनोविज्ञान के सापेक्ष तार्किक अध्ययन में ऐसे कई उदाहरण सत्य सिद्ध होते हैं जहाँ तनावों का प्रदर्शन भिन्न रोग लक्षणों में होता है।

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