हिन्दी के प्रथम वक्ता

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विहार के सारण  (दरभंगा )से स्वराज पार्टी के उम्मीदवार के रूप में नारायण प्रसाद सिंह  सेंट्रल लेजिस्लोटिव असेंबली 1926  का चुनाव  जीत कर दिल्ली पहुंचे ।तब अंग्रेजों की असेंबली में कार्यवाही की भाषा अंग्रेजी थी, उन दिनों सरदार वल्लभ भाई पटेल के अग्रज विट्ठल भाई पटेल असेंबली के अध्यक्ष थे ।नारायण बाबू ने पब्लिक सेफ्टी बिल पर हिन्दी में बोलने के लिए अध्यक्ष से अनुमति मांगी ।अध्यक्ष बिल पर बोलने की तो अनुमति दे रहे थे पर हिन्दी में बोलने पर सहमत नहीं थे । अध्यक्ष ने नारायण बाबू को  अपने कक्ष में बुलाया और हिन्दी में न बोलने के लिए समझाने लगे ।अध्यक्ष पटेल साहब अग्रेजी में बोल रहे थे और नारायण बाबू उसका जवाब हिन्दी में दे रहे थे ।आखिरकार झुंझलाकर विट्ठल भाई पटेल ने कहा, आप हिन्दी में बोलने के लिए क्यों हट कर रहे हैं? नारायण बाबू बोले, क्योंकि मुझे अंग्रेजी नहीं आती और हिन्दी मेरी मातृभाषा है ।में हिन्दीभाषी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हूं।पटेल जी ने पूछा, ‘तो फिर आप मेरी अंग्रेजी में कही बात कैसे समझ पाते रहे हैं।नारायण बाबू ने कहा, जैसे आप मेरी कही बात को समझ रहे हैं।आवेश में आकर पटेल जी ने कहा, आप यहां लड़ने आए हैं या बहस करने ।नारायण बाबू ने विनम्रता से कहा,अध्यक्ष महोदय आया तो  मैं काम करने हूं किन्तु आवश्यकता पड़ी तो बहस करने में भी पीछे नहीं रहूंगा ।नारायण बाबू के आत्मविश्वास पूर्ण कथन को सुनकर पटेल जी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने हिन्दी में बोलने की अनुमति दे दी ।भारतीय संसदीय इतिहास में नारायण प्रसाद सिंह को हिन्दी का प्रथम वक्ता होने का सौभाग्य और गौरव दोनो प्राप्त हो गया ।

-सुरेन्द्र अग्निहोत्री 

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