- धर्मेन्द्र गुप्त साहिल

प्रतिष्ठित ग़ज़लकार-कवि अभिनव अरुण की पाँचवीं कृति ‘ढीली मिट्टी का चाँद ‘ उनकी बानबे प्रतिनिधि कविताओं की पठनीय पुस्तक है। इस संग्रह में अभिनव ने अपने समकाल को अपनी विशिष्ट शैली में अभिव्यंजित किया है। यथार्थ के ठोस धरातल पर खड़े हो कर अपनी पैनी दृष्टि से उन्होंने वर्तमान काल खण्ड के सम्पूर्ण परिदृश्य को देखा है। वर्तमान समय की राजनीतिक एवं सामाजिक विसंगतियों को देखकर उनकी संवेदना छटपटा उठती है। प्रत्येक असंगत, विषम एवं असहनीय यथार्थ पर उनकी लेखनी अनायास चल पड़ती है। उनके पास शब्दों का अनूठा भण्डार है जिसमें से वे विषयानुकूल शब्द चयन कर लेते हैं। संग्रह की पहली कविता ही इस बात का प्रमाण है –
यह प्रहार का युग है/नई भाषा/नवीन लिपि संस्कारों का युग/
विश्व की प्रत्येक पुस्तक सुप्त है/एक ही ज़िल्द में स्वप्नवत/
उम्मीदें नीली फ़िल्में देख रहीं
(अभिशाप)
इस कविता में कवि ने अपने समकाल के कटु यथार्थ को व्यक्त करते हुए क्रान्ति और विद्रोह की आवश्यकता की ओर संकेत किया है।
लोकतंत्र की वास्तविकता को उद्घाटित करते हुए अभिनव कहते हैं —
लोकतन्त्र को जम्हाई आ रही/
उसने मनाई है महाशिवरात्रि /
पा लिया है महाप्रसाद
(लोकतन्त्र)
प्रत्येक कालखंड में सर्वहारा वर्ग उपेक्षित, तिरस्कृत रहा है। व्यवस्था ने उन पर ध्यान देने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती । ‘राजपथ से परे कविता’ में कवि ने इस मार्मिक यथार्थ को प्रभावपूर्ण ढंग से अभिव्यंजित किया है —-
छोटे घर वाले छोटे घर में खुश रहने की कोशिश करते हैं /
और बिना घर वाले? घर की उम्मीद में दुआ करते हैं /
उन्हें न छोटे घर वालों से कोई शिकायत होती है
/न बड़े घर वालों से ईर्ष्या /
नगर निगम की जेसीबी बदल देती है जिनके ठिकाने /
बिल्डिंगों के पीछे फेंके तिरपाल को जो बना लेते हैं अपनी छत
………… जो कोई अख़बार नहीं पढ़ते /पालते हैं
अपनी कोख में समय की नाजायज़ संतानें राजपथ से परे
कुर्सियों पर बैठे सत्तालोलुप केवल अपनी कुर्सी बचाने के प्रयास में लगे रहते हैं, इसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े। ‘इस दौर में’ कविता की कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं —
सिरमौर हैं साहबों वाली कुर्सियाँ जो घूमती हैं /
कभी इस तो कभी उस पाले /कुछ हैं सर्वहारा कुर्सियाँ जिन पर बैठते हैं फरियादी /
और जिनसे घिन्नाते हैं बुर्जुआ एलीट
यदि परिस्थितियाँ नहींं बदलीं और हमने मशालें नहीं जलाईं, आवाज़ नहीं उठाई तो यही होगा —-
सब मरेंगे जो/ मरे हुए हैं वो सबसे पहले/ बिना प्रतिरोध के/
जो ज़िन्दा हैं/वो उनके बाद/लड़ते हुए
(तुम्बे तुमड़ी)
ऐसे में अभिनव उदघोष करते हैं —
आओ अलाव जलाएँ /ताकि कुछ रोशनी हो /
आओ कोहरे से युद्ध का ऐलान करें /क्योंकि युद्ध रत आदमी ही/
समय का आदर्श है
(उदघोष)
समीक्ष्य कृति में रचनाकार ने अपने काल खण्ड के अनेक ज्वलंत विषयों एवं समस्याओं को प्रकाशित किया है । प्रकृति और हम, गाँव आदि कविताओं में अभिनव ने प्रकृति क्षरण , गाँवों का शहरीकरण आदि विषयों को चिंतनीय विषय वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया है —
मैंने पाया /मेरा गाँव /उपनिवेश हो गया है/
शहर का/ वहाँ भी बिखरे पड़े हैं/
शहर के निशान/संसाधनों ने मिटा दिए हैं सम्बन्ध
(गाँव)
संतान के जीवन में माता पिता का कितना महत्व है, यह उनके न रहने के बाद समझ में आता है। जीते जी हम उनकी क़द्र नहीं कर पाते , किन्तु जो उनकी क़द्र करते हैं वे धन्य हो जाते हैं —
मैंने पिता को तब जाना /जब मेरी सारी उम्मीदें टूट चुकी थीं /
मैंने माँ को तब देखा/जब शहर के मन्दिरों के कपाट बंद थे
(माँ)
संग्रह की अनेक रचनाओं में कवि का जीवन दर्शन भी दीप्तिमान है। यथा —
गमलों या बागों में नहीं /
कहीं हमारे भीतर ही होता है/ हरियाली का घर
(हरियाली का घर)
इसी प्रकार तितली कविता में वे कहते हैं –
प्रेम और घृणा दोनों ही
रक्त कणिकाओं में प्रवाहित होते रहते हैं/
निरन्तर
इस संग्रह से यह रहस्य भी उद्घाटित हुआ कवि अपने समय के प्रति ही संवेदनशील नहीं है वरन् उसके हृदय में प्रेम के लिए भी स्थान है, किन्तु उनका प्रेम भी अपने विशिष्ट तेवर में है। ‘प्रेम संदली’ कविता में रचनाकार ने प्रेम की गहनता को स्पर्शी अभिव्यक्ति प्रदान की है –
दूर खलिहान के छोर /जब खोटती हो तुम चैन की पोर /
तीखी चटनी के साथ /भीगी हवा बजाती है/
प्रेम रस बंसरी साथ छिद्रों वाली/ मैं सुन लेता हूँ
प्रेम की बोली तुम्हारी
इस संग्रह में बनारस ‘ शीर्षक’ कविता भी उल्लेखनीय है। तीन खण्डों में विभक्त इस कविता में अभिनव ने बनारस के बदलते स्वरूप को लेकर चिन्ता व्यक्त की है-
विशाल तराशे प्रस्तर स्तम्भों में /दिन ब दिन दबती जा रही/
एक बूढ़े शहर की कराह
इस कविता में व्यंजना के साथ साथ अद्भुत चित्रात्मकता है।
कविता के विषय में अभिनव डिण्डिम घोष करते हुए कहते हैं —
बचा रखना थोड़ी सी जगह/ उन कविताओं के लिए /
जो रास्ता काटती हैं /पर अपशकुन नहीं होतीं /
जिनका टोकना शुभ होता है और सत्य के सापेक्ष भी/
जिंदा रखना नुकीली कविताओं की कालजयी धार
(राग विराग)
इस कृति की शीर्षक कविता का उल्लेख किए बिना आलेख समाप्त नहीं किया जा सकता। चाँद तो सदियों से कवियों का प्रिय प्रतीक रहा है जिसके माध्यम से कवियों ने जीवन के अनेक आयामों, मिलन -विछोह, आशा -निराशा, उल्लास -अवसाद आदि को शब्दों में ढाला है। अभिनव अरुण ने इस कविता के माध्यम से वर्तमान समय के सम्पूर्ण परिदृश्य को सार्थक अभिव्यंजना प्रदान की है कुछ पंक्तियाँ रेखांकित किए जाने योग्य हैं —
तुम्हारी कविताएँ पढ़ी हैं मैंने
व्यंजनाएँ उपमाएँ बिम्ब विधान/ सब के सब /
यही हैं मेरे अमृत कलश /तभी मैं अमृत हूँ/
शरद का चाँद /हर आंगन में रखी मीठी खीर चखी है मैंने/
हर दिए की रोशनी में नहाया हूँ मैं /
मैं तुम्हारा आभारी हूँ/तुम सबका आभारी/
ढीली मिट्टी का चाँद
(ढीली मिट्टी का चाँद)
इस सहज सम्प्रेषणीय, धारदार कृति का काव्य जगत में स्वागत होगा ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए | यही विश्वास कविता के शाश्वत होने का प्रमाण भी होता है और कवि के लिए निरंतर रचने की प्रेरणा भी |

