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सुनीता सिंह

सूर्य से निकलकर
चहुँओर  पसरी
सप्तरंगी इंद्रधनुषी
रश्मियों की मंजूरी ।
नव कोपले  सी,
नव पुंज -दलो सी
नव कल्लो के  बौर सी,
नव गुच्छ के नव ठौर सी,
धुंध में भी  रास्ता दे ,
जीत का भी वास्ता दे ,
फिर हो उम्मीद की डगर
चाहे जितनी  संकरी
राह  दिखाती है तब भी
रश्मियों की मंजरी ।
अंकुरण के उद्भवों तक
हर चरण में
बढ़ती- ढलती उम्र के
हर दहर में ,
स्याह कोनों में,
उजाले ढूंढती है
हर पहर में अपने नभ पर,
उम्र के समरस,
मुनासिब रंगत का
सूरज ढूंढती है ।
सूर्य रश्मिायां ,
रंगों की थेरेपी से
उपचार भी करती।
सघनता में शीतलता,
गहन शीत में ताप देतीं।
विषाद से सूखती धरती पर
नेह जल बरसा जातीं।
अंधेरी राहों में,
उम्मीद बनकर साथ निभातीं।
जीवन का विस्तृत नभ,
मन के बहु आयामों में,
स्याह उजाले बादलों में,
विविध वय के द्वंद में
पृथक-पृथक समय पर,
पृथक रश्मि की रंगत की
प्रधानता लिए
कितने सूरज देखता है।
समग्रता में समेट कर,
रंगों में लपेटकर,
असर छोड़ ही गहरी।
जीवन बढ़ता है आगे,
साथ लेकर,
सप्तवर्णी सूर्य मंजरी।

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