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रचनाकार: नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर,

मौसम-ऋतु परिवर्तन हुआ,परमेश्वर-प्राणी-प्रकृति मेल,राग-द्वेष रहित सम्बन्ध है, प्रेम-सम्बन्ध का है खेल॥

माता की आराधना हुई, नवरात्र मर्यादा विजय,रावण परास्त हुआ रण में, वर्षा-बाढ़ से मुक्त समाज॥

शरद ऋतु का आगमन हुआ,निशा-निद्रा काल बढ़ गया,दिवस अवसान लघु हुआ, दक्षिणायन हर्ष उत्कर्ष॥

चंद्र कलाओं का काल-समय, मृगांक मनोहर मनभावन,शरद पूर्णिमा जीवन में, जन्मेजय आगमन पावन॥

हर्षित मन रसछंद प्रवाह, निर्मल निर्झर अविरल धार,
अमृत मन शांत चित्त हुआ, प्रसन्न मन है अपरम्पार॥

पूर्ण कलाओं से पूर्ण हुई, परिपूर्ण शरद पूर्णिमा,चंद्र निशा पल-प्रहर सुन्दर, अति सुन्दर है महिमा॥

सुहाना चंद्र चाँदनी से, जीवित जाग्रत जन्मेजय,वर्षा ऋतु जल जीवन की, वर्षा की महिमा है अक्षय॥

सावन-भादों का क्रम गया, शरद सत्य ऋतु संसार,श्वास प्रवाह का नित्य है, निरंतर समय-काल अपार॥

जल जीवन की शृंखला है, शरद ऋतु चंद्र का स्वागत,वंदन अभिनन्दन करिये, चंद्र का करिये अभिनन्दन॥

पूर्ण चंद्र चाँदनी की, अमृत वर्षा सत्य सनातन,अभिमान सनातन का है, यही हमारा है अभिमान॥

अमृत वर्षा हर्ष उत्साह, उत्कर्ष मन अमृत अभय,निर्भय जीवन चंद्र चाँदनी, मानव जीवन उत्सव उत्साह॥

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