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सरताज सबीना

राहों की खामशी के मंजर बदल गये-
आंधी का जोर मौसम के तेवर बदल गये,
राहों की खामशी के मंजर बदल गये।
हर इक पत्ता अपनी जगह पर लरज गया,
मासूम पंछी खौफ से कुछ दूर छुप गये।
कुछ काले कासनी,व सफेद बादलों के गोल,
धरती गगन के बीच में दरिया सा बन गये।
कमजोर पत्ते टूट के हर सिक्त बिखर गये,
बिजली की गड़गड़ाहट से मासूम डर गये।
सकते  में चांदनी, को वह बेरंग सा कर गये,
कुछ साईंबां उड़े और बेप्पर सा कर गये।
वो तेरी रहबरी  के बादे  कहां गये,
मौसम की एक आंधी से सब राज खुल गये।

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