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-डॉ0 रश्मिशील

उदारमना एवं संवेदनशील व्यक्ति : जन्म एवं शिक्षा
‘काव्यं तु जायते जातु कस्यचित प्रतिभावतः’ अर्थात्, श्रेष्ठ साहित्य की सर्जना किसी सच्चे प्रतिभावान से ही सम्भव है।
आचाय भामह के इस कथन से स्पष्ट है कि रचना का हेतु प्रतिभा है। इसी प्रकार प्रतिभा को सर्वापरि मानते हुए आचार्य
रुद्रुट कहते हैं कि जिसके बल पर एकान्त मन में प्रस्फुटित होने वाले बहुविध विषयों को अनुकूल शब्दों में ढालकर कवि
सहज ही व्यक्त कर देता है। वह शक्ति या प्रतिभा कहलाती है। प्रत्येक साहित्यकार अपनी क्षमता और प्रतिभा के
अनुसार साहित्य सेवा करता है परन्तु कुछ साहित्यकार ऐसे होते हैं जो साहित्य सृजन के माध्यम से न केवल अपनी
प्रतिभा का परिचय देते हैं वरन् कल्याणकारी सृजन के द्वारा समाज को नई ऊर्जा व दिशा भी प्रदान करते हैं। वे अपनी
लेखनी से सामान्य जन को मनोरंजन, लोकरंजन और ज्ञानरंजन से संपृक्त करते हुए इतिहास में भी अपनी विशिष्ट
भूमिका निभाते हैं। डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी ऐसे ही सजग व संवेदनशील रचनाकार हैं, जिनकी सक्रिय लेखनी ने बहुमूल्य
साहित्य सृजन कर साहित्य भण्डार की श्रीवृद्धि की है।
‘स यत्स्वभावः कविः तद्नुरूपम काव्यम्’ अर्थात कवि का जैसा स्वभाव होगा, वैसी ही उसकी सर्जना भी होगी। रचनाओं में
व्यक्त विचारों से कवि की स्वभावज प्रवृत्ति का ज्ञान होता है। साहित्य मनीषी, बहु आयामी, साहित्य सर्जक, दोहाकार,
व्यंग्यकार, यशस्वी साहित्य मनीषी के रूप में ख्यातिलब्ध डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी की समृद्ध सृजन साधना अनवरत्
प्रवहमान है। विभिन्न राष्ट्रीय साहित्यिक संस्थाओं द्वारा अनेक सम्मानों व अलंकरणों से विभूषित उनका व्यक्तित्व एवं
कृतित्व अभिनंदनीय है।

डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी का जन्म 15 अगस्त, 1951 को ग्राम-मोतीपुर, जिला-लखीमपुर में हुआ। आपके पूर्वज जिला गोंडा,
ग्राम त्योरासी के निवासी थे, जो लगभग 300 वर्ष पूर्व लखीमपुर खीरी और बहराइच के बीच बसा एक गाँव अवस्थी पुरवा
में जो कि खैर के जंगल काटकर बसाया गया था, आकर बस गए। यह खीरी जिले का एक तराई इलाका था और यहाँ
स्थाई रूप से प्रतिवर्ष बाढ़ आती थी। इसलिए खेती व बुद्धि होते हुए भी रोटी, कपड़ा, मकान जैसी मूलभूत आवश्यताओं
की समस्या बनी ही रहती थी। इसीलिए आपके बाबा शम्भूदयाल अवस्थी जी अपने परिवार के साथ ग्राम मोतीपुर में
आकर बस गए। यह गाँव सीतापुर से लखीमपुर की ओर चलने पर लखीमपुर जिले से लगभग 7 किलोमीटर पहले पड़ता
है। यहीं पर स्व0 शम्भूदयाल अवस्थी के पुत्र अवध बिहारी लाल अवस्थी के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में अवस्थी जी का जन्म
हुआ।
जब अवस्थी जी पाँच वर्ष के थे, तभी आपके पिता श्री अवध बिहारी लाल अवस्थी जी अपनी बहन के गाँव मोहल्ला
हाथीपुर आ गए। वहीं के नगरपालिका स्कूल से आपकी शिक्षा प्रारम्भ हुई। एक वर्ष पश्चात मोहल्ला राजगढ़ में ईदगाह
के स्कूल से तीसरी, चौथी व पाँचवीं दर्जे की पढ़ाई की तथा राजकीय इण्टर कॉलेज, लखीमपुर खीरी से इण्टरमीडिएट की
परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1974 में युवराज दत्त महाविद्यालय से कम्पोजिट इतिहास विषय लेकर स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण
की। शिया पी0जी0 कॉलेज, लखनऊ से एल0एल0बी0 की डिग्री प्राप्त की। सन् 1999 में हिन्दी अनुवाद में डिप्लोमा तथा
2003 में लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएच0डी0 की उपाधि प्राप्त की।
डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी प्रारम्भ से ही कर्मठ, मेहनती, ईमानदार व जुझारू रहे। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि कर्म
निष्ठा, ईमानदारी व राष्ट्रभक्ति का गुण इन्हें विरासत में मिला। वस्तुतः आपके पिता जी ने आपके अंतस में राष्ट्रप्रेम व

समाज सेवा का भाव विकसित किया तथा आप उनके द्वारा बताए गए आदर्श के आलोक में निरन्तर आगे बढ़ते रहे।
आपके पिता स्वयं एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने 1921 में मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण की थी, इसलिए वे शासकीय
नौकरी प्राप्त कर आराम से जिंदग़ी बसर कर सकते थे, परन्तु इसके विपरीत उन्होंने स्वतंत्रता-संघर्ष, समाज सेवा व
साहित्य सृजन की राह चुनी। राष्ट्र भक्ति की भावना उनमें कूट-कूट कर भरी थी अतः उन्होंने प्रण लिया कि वे अंग्रेज
सरकार की सेवा नहीं करेंगे। यद्यपि उन्होंने कुछ समय राजा ओयल, लखीमपुर, खीरी में भंडारी के पद पर नौकरी की,
परन्तु खरीद फरोख़्त में अनियमितताओं से समझौता करना उनके सिद्धान्त के खिलाफ था,अतः उन्होंने नौकरी छोड़ दी
और स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय सहभागिता करने लगे। कहते हैं कि अवध बिहारी के बहनोई साधू हो गए थे। किसी
के द्वारा यह ज्ञात हुआ कि वे कोलकाता में हैं तो उन्हें ढूँढते हुए वे 1927 में कोलकाता गए। बहनोई तो नहीं मिले, परंतु
वे नेता जी व महात्मा गाँधी के आन्दोलन से इतना प्रभावित हुए कि बड़ा-बाजार काँग्रेस कमेटी, कोलकाता के सदस्य बन
गए और स्वातंत्र्य समर में कूद पड़े। सविनय अवज्ञा आन्दोलन के अन्तर्गत 5 फरवरी, 1930 को नमक सत्याग्रह की
घोषणा हुई तथा कलकत्ता में भी सत्याग्रहियों की गिरफ्तारियाँ हुईं। अवस्थी जी भी सत्याग्रहियों की सभा का नेतृत्व करते
हुए पकड़े गए और 6 माह की जेल हुई। बकसाल कोर्ट, कोलकाता 13 मई, 1930 को वे प्रेसीडेंसी जेल भेजे गए, परंतु 14
मई 1930 को उन्हें अलीपुर सेन्ट्रल जेल स्थानान्तरित कर दिया गया। यहीं पर उनका परिचय नेता जी सुभाष चन्द्र बोस,
बिपिन बिहारी गांगुली, डॉ0 सेन गुप्ता, बाबूराम लगन सिंह, अर्जुन सिंह आदि स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं से हुआ। पुनः
14 नवम्बर, 1930 को लोक सेवक द्वारा सम्यक रूप से प्राख्यायित आदेश की अवज्ञा के जुर्म में बागान कोर्ट, कोलकाता
द्वारा उन्हें 6 माह का कारावास दिया गया। परंतु बाद में 5 मार्च, 1931 को गाँधी जी और अंग्रेजों के बीच इरविन पैक्ट
समझौता होने पर सभी आन्दोलनकारी रिहा किए गए। जिससे अवस्थी जी भी रिहा हो गए। उनके देश के लिए किए गए
अनशन व त्याग के फलस्वरूप कान्यकुब्ज भ्रातृमण्डल, कोलकाता द्वारा उनका अभिनंदन किया गया। स्वतंत्रता के
पश्चात वे प्रधान हुए परंतु प्रशासन की व्यवस्थाओं से समझौता न कर पाने के कारण उन्होंने राजनीति से किनारा कर
लिया। स्मृति निधि नामक कृति में डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी अपने पिता का स्मरण करते हुए लिखते हैं, ‘श्री अवस्थी
बहुत ही निर्भीक, परोपकारी, ईमानदार, सत्य बोलने वाले, सभी का दुःख-दर्द समझने वाले, कमजोरों, गरीबों के पक्षधर थे।
शरीर से बहुत ताकतवर होते हुए भी अपने जीवन में किसी को नहीं सताया। पढ़े-लिखे होते हुए भी अंग्रेज सरकार की
नौकरी करना पसंद नहीं किया। स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया, परंतु लाभ उठाने का प्रयास नहीं किया। जीवन में गरीबी
से संघर्ष किया परन्तु कभी बेईमानी नहीं की, कष्टों में रहे, परन्तु न तो सिद्धान्त-नीति-धर्म छोड़ा और न परोपकार।
आर्थिक रूप से कमजोर होते हुए भी अत्याचार का विरोध किया। वे आजीवन ईमानदार और अपनी बात के पक्के रहे।’
अपने पिता के समान ही डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी भी निर्भीक, परोपकार, ईमानदार व सत्यव्रती हैं। पिता ने जहाँ
अपने पुत्रों को देश-भक्ति का पाठ पढ़ाया, वहीं माँ ने अपने पुत्रों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाया। एक स्वतंत्रता संग्राम
सेनानी, त्यागी व समाजसेवी के पुत्र के रूप में डॉ0 अवस्थी सदैव अपने माता-पिता के सिद्धान्तों के अनुयायी रहे।
जीविकोपार्जन
डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी आरम्भ से ही कर्मठ, ईमानदार व अनुशासन प्रिय व्यक्ति रहे हैं। आपने सदैव कर्म को ही भाग्य
निर्माता समझा। 15 अगस्त, 1969 में सिंचाई विभाग में नैतिक कोटि लिपिक के पद पर आपने अपनी जीविका प्रारम्भ
की, परन्तु प्रतियोगी परीक्षाएँ आप लगातार दे रहे थे। 18 जुलाई, 1975 में आप लोक सेवा आयोग की अवर वर्ग की
परीक्षा उत्तीर्ण कर सचिवालय सेवा में आए और सहायक सेवा योजन अधिकारी के रूप में नियुक्त हुए तथा जुलाई, 1979
में अवर प्रवर वर्ग की पुनः परीक्षा उत्तीर्ण की तथा दिसम्बर, 1981 में पुनः सचिवालय में नियुक्त हुए। तदुपरान्त जुलाई,
1985 में कोषाधिकारी राज्य वित्त एवं लेखा सेवा में अपनी नौकरी प्रारम्भ की तथा 1989 फरवरी में अनुसचिव
लेखाधिकारी के पद पर विधान सभा में नियुक्त हुए। यहीं से 2011 में विशेष सचिव एवं वित्त नियंत्रक के पद से
सेवानिवृत्त हुए और वर्तमान में विधि वेत्ता के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।

साहित्य एवं समाज सेवी
डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी एक सजग, कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी होने के साथ ही अत्यन्त सहृदय एवं संवेदनशील व्यक्ति
हैं। उनकी संवेदना ही उन्हें सृजन की ओर उन्मुख करती है। बचपन में लखीमपुर खीरी में मेला-मैदान में दशहरे का मेला
लगता, वहीं संकटा देवी के मंदिर में प्रवचन होता था, जिसे वे सुनने जाते थे। धार्मिक उपदेशों का बालक दिनेश के मन
पर गहरा प्रभाव पड़ा। बचपन में अंकुरित आध्यात्मिक व सात्विक विचारों ने अवस्थी जी के व्यक्तित्व को निर्मित किया।
साहित्य सृजन की प्रेरणा आपको अपने पिता से मिली। वे स्वयं अच्छे रचनाकार थे व भजन लिखते थे तथा उन्हें गाते
भी थे। साथ ही वे एक कुशल वक्ता भी थे। डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी उनके गुणों का स्मरण करते हुए लिखते हैं,
”उन्हें बच्चों से बहुत लगाव था। अपने घर के, पास-पड़ोस के बच्चे आ जाते थे और गाँवों में वे जाते थे वहाँ भी उन्हें
बच्चे घेर लेते और उनसे कथाएं सुनते। वे कुछ आप बीती सुनाते और कुछ जग बीती। उनकी कथाएँ सुनाने की शैली
बहुत रोचक थी। उन्हें बहुत सारे संस्कृत के श्लोक याद थे, कहावतें, मुहावरे याद थे। स्वतंत्रता संग्राम के आज़ादी के तराने
याद थे। वह भी बीच-बीच में सुनाते थे, जिससे उनकी शैली में चार चाँद लग जाते।” धीरे-धीरे पिता के गुण स्वाभाविक
रूप से बालक दिनेश में भी विकसित होने लगे। सन् 1989 में अवस्थी जी अपने माता-पिता को रामेश्वरम व कन्याकुमारी
इत्यादि धार्मिक स्थलों के दर्शनार्थ लेकर गए, तब रास्ते में अपने पिता से उन्हें बहुत से स्वरचित भजनों को सुनने का
सुअवसर प्राप्त हुआ और शनैः शनैः वे स्वयं भी साहित्य की ओर प्रवृत्त हुए। अपनी साहित्यिक अभिरुचियों को सृजन के
द्वारा अभिव्यक्त करने के साथ ही आपने प्रशासनिक सेवा के दौरान सचिवालय के अनेक सहृदय, सरस रचनाकारों को
जोड़ने का कार्य किया और एक साहित्यिक संस्था की नींव रखी। 1996 में आपके प्रयासों से राज्य कर्मचारी साहित्य
संस्थान, उ0प्र0 नामक संस्था का संगठन किया गया, जो स्वयं में अद्भुत संस्था है। यह संस्था राजकीय सेवा में संलग्न
साहित्यकारों को साहित्यिक मंच प्रदान करती है। प्रारम्भ में इस संस्था में केवल प्रति माह काव्य गोष्ठियाँ होती थीं। 23
जून, 1999 को श्री उमेश कुमार सिंह चौहान, जो कि केरल कैडर के आई0ए0एस0 थे नवल किशोर रोड, पर्यटन विभाग में
प्रतिनियुक्ति पर आए, तब उन्हें इस संस्था का अध्यक्ष नियुक्त किया गया और 23 जून, 1999 में उनकी अध्यक्षता में
बैठक की गई। धीरे-धीरे यह संस्था उत्तरोत्तर विकसित होती गई। वर्तमान में यह संस्थान सुगठित रूप में प्रतिष्ठित एक
मात्र ऐसा संस्थान है, जो राज्य कर्मियों को उल्लेखनीय साहित्यिक अवदान के लिए प्रोत्साहित करता है, पुरस्कृत करता है।
इस संस्थान के माध्यम से प्रकाशित ‘अपरिहार्य’ त्रैमासिक पत्रिका में साहित्य सेवियों की रचनाओं का प्रकाशन कर उन्हें
नियमित सृजन हेतु प्रेरित किया जाता है। डॉ0 अवस्थी जी इस संस्थान के संस्थापक व महामंत्री के रूप में निरन्तर
अपनी सेवाएँ देकर संस्था की गरिमा में श्रीवृद्धि कर रहे हैं।
प्रशासकीय सेवा से अवमुक्त होने के पश्चात आप उ0प्र0 राजकीय सिविल पेंशनर्स परिषद के महामंत्री बने। 16 वर्षों के
बाद आपने इस पद से अपने को विमुक्त कर लिया, परंतु आज भी इस संस्था को आवश्यकतानुसार अपने सुझाव व
परामर्श से यथासम्भव सहयोग प्रदान करते हैं। समाज के लिए सेवा व सहयोग की भावना रखते हुए सामाजिक कार्यों में
संलग्न रहना आपको विशिष्ट बनाती है। आपने अवध बिहारी श्याम लल्ली विद्या संस्थान नामक संस्था अपने गृह
जनपद लखीमपुर खीरी में स्थापित की है। इस संस्था के माध्यम से आप वर्ष 2008 से प्रतिवर्ष हाईस्कूल व इण्टरमीडिएट
में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने वाली मेधावी छात्राओं को पुरस्कृत करते हैं। बच्चों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना को
विकसित करने के लिए प्रतियोंगिताएँ करवाते हैं तथा गरीबों में कम्बल बँटवाते हैं। इसके अतिरिक्त उ0प्र0 विधान मण्डल
पेंशनर्स कल्याण संगठन में भी आप महामंत्री के पद को सुशोभित करते हैं।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, अनुभव एवं अनुभूतियों के
साथ ही सामाजिक सरोकारों से जुड़े यथार्थवादी संचेतना से जुड़े व्यक्ति हैं, जिनकी कथनी करनी में समानता है। वे
व्यक्ति, परिवार, समाज व देश के प्रति वे व्यक्ति, परिवार, समाज, देशहित के प्रति समर्पित उदारमना व रचनाकार हैं।
दिनेश चन्द्र अवस्थी का रचना संसार

सृजन, प्रकाशन, प्रोत्साहन और साहित्यिक आयोजनों के माध्यम से डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी ने हिन्दी भाषा व
साहित्य को अधिकाधिक ग्राह्य व प्रचार-प्रसार की दिशा में जो योगदान दिया वह सर्वथा स्तुत्य है। आपने पहली कविता
वर्ष 1989 में जब आप नैनीताल में पी.सी.एस. की प्रशिक्षण ले रहे थे, तब लिखी थी। यद्यपि वह कविता आज अनुपलब्ध
है तथा उसका अंश भी अवस्थी जी को स्मरण नहीं है परंतु उसके पश्चात आपकी लेखनी रुकी नहीं और निरन्तर काव्य
साधना में संलग्न रहे। आपके द्वारा प्रणीत कृतियों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है :-
दिनेश की कुण्डलियाँ-
वर्ष 1996 में कवि का प्रथम काव्य संग्रह ‘दिनेश की कुंडलियाँ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। वर्तमान में यह कृति अनुपलब्ध
है। कवि के पास भी यह कृति संरक्षित नहीं है। इस कृति के प्रकाशन की सूचना कवि के दूसरे संग्रह ‘सामयिक कुंडलियाँ’
में कवि के शब्दों में उल्लिखित है कि -”मुझे कुण्डलिया छंद शुरू से प्रिय रहा है। इसमें नीति, राजनीति, हास्यव्यंग्य आदि
भावों को भली प्रकार व्यक्त किया जा सकता है। इसके पूर्व ‘दिनेश की कुंडलियाँ’ नाम से एक संग्रह 1996 में प्रकाशित हो
चुका है। इस प्रकार मैं लगभग चार वर्षों से इस पर कार्य कर रहा हूँ।”
सामयिक कुण्डलियाँ-
वर्ष 1999 में कविवर दिनेश चन्द्र अवस्थी का द्वितीय काव्य संकलन ‘सामयिक कुण्डलियाँ’ सुलभ प्रकाशन, लखनऊ से
प्रकाशित हुआ। कृति के शीर्षक के संदर्भ में अवस्थी जी लिखते हैं, ‘चूँकि कविता संग्रह में सामयिक विषयों, परिस्थितियों
एवं वातावरण को ही विषय बनाया गया है, अतः पुस्तक का नाम सामयिक कुण्डलियाँ रखा गया है।
प्रस्तुत कृति को 11 शीर्षकों में विभाजित किया गया है, जिनके नाम कृमशः पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक, कार्यालयी,
भ्रष्टाचार, अवसरवादिता, हास्य व्यंग्य, कविकविता, नीतिपरक, उपदेशात्मक और आध्यात्मिक हैं। प्रारम्भ में सरस्वती वंदना
और महावीर वेदना के दो कुंडलिया छंद संकलित हैं। प्रथम छंद के द्वारा कवि ने अपने सृजनशीलता को लोक कल्याण
की ओर अग्रसर करने की कामना से माँ सरस्वती की वंदना की है। कवि की अभिलाषा है कि इस देश में जन्म लेने वाले
प्रत्येक व्यक्ति को समानता का दर्जा मिले, किसी प्रकार का भेद-भाव न हो, यह देश स्वर्ग के समान हो :-
जन्में सभी समान, भेद-भाव का हो शमन,
बने स्वर्ग सा देश, सभी करें इसको नमन।
इस कृति को तत्कालीन अध्यक्ष माननीय केशरी नाथ त्रिपाठी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ है, वे लिखते हैं, ‘श्री अवस्थी एक
संवेदनशील, भावुक और तत्वदर्शी रचनाकार हैं। वे खुली आँखों से अपने आस-पास की वस्तुओं, विषयों एवं घटनाओं को
देखते हैं तथा उन पर मनःचिंतन कर अपने निजत्व का पुट देते और अत्यंत प्रभावशाली भाषा में छंदाकार प्रदान करते
हैं।’
प्रस्तुत कृति में कवि ने वर्तमान में हो रहे साँस्कृतिक मूल्यों के ह्रास, सामाजिक विसंगतियों, मानव जीवन की असंगतियों,
परिस्थिति जन्य स्थितियों, परिस्थितियों, घटनाओं व प्रसंगों को केन्द्र में रखकर अपनी लेखनी चलाई है। कवि ने घर-
परिवार समाज में हो रहे निरंतर घात-प्रतिघात को अत्यंत सहज रूप से अभिव्यक्त किया है। व्यंग्य के माध्यम से वे
वर्तमान परिदृश्य को न केवल रेखांकित करते हैं, वरन् पाठकों को अपने कथ्य की मीठी चुभन से झकझोरते हैं और उन्हें
सोचने के लिए विवश भी करते हैं। अवसरवादी होना, अपने अधिकारियों को प्रसन्न रखने के लिए दाँव-पेंच अपनाना, काम
निकल जाने पर रंग बदल लेना जैसे चापलूस और राजनीतिक वातावरण की उन्होंने खूब कलई खोली है। उनका मानना
है कि यह कलियुग है यहाँ पर दाँव-पेंच चलाना, विश्वासघात करना, मक्कारी करना, अवसरवादी गुण है :-
कलियुग का है समय मिले इसमें दुख ही दुख।

मक्कारी लो सीख, चाहते यदि पाना सुख।।
विषय वैविध्य से परिपूर्ण इस कृति के संदर्भ में डॉ0 सत्यदेव मिश्र, रीडर, हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, पुरोवाक
में लिखते हैं, ‘अवस्थी जी की कुंडलियाँ विषय-वैविध्य से परिपूर्ण है। ऐसा प्रतीत होता है कि विविध विषयों पर समय-
समय पर काव्य दशा में उतरते हुए उन्होंने ये कुंडलियाँ लिखी हैं। अन्यान्य जीवनानुभवों और लाभानुभवों का सरल ढंग
से प्रस्तुतिकरण इनमें हुआ है। लाभाचरण की दृष्टि से अत्यंत सारगर्भित तथा जीवनोपयोगी है।
प्रस्तुत कृति में कवि की संवेदना विविध रूपों में प्रकट हुई है, वे आस-पास की घटित घटनाओं, वैयक्तिक संकीर्णताओं,
परिस्थितिजन्य विषमताओं व समाज, राजनीति, आध्यात्म आदि आधारभूत कारणों का भली-भाँति चिंतन-मनन कर उन्हें
अपनी कुंडलियों के माध्यम से प्रकट करते हैं। ये कुंडलियाँ कहीं पाठक अथवा श्रोता को हँसाती हैं, गुदगुदाती हैं, सार्थक
मनोरंजन करती हैं, तो कभी शब्दों की चोट से उन्हें तिलमिला देती हैं। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ0 रामाश्रय सविता जी का
कथन है कि ‘इनमें एक सही इंसान की सोच सरोकार है निश्छल और निर्वयैक्तिक दृष्टि का संज्ञायन है, भारतीय मनीषा
का रूपायन है तथा वह सब कुछ है जो आपको भटकायेगा नहीं, सन्मार्ग पर ही ले जायेगा।’
प्रस्तुत कृति में व्यंग्य की पैनी चोट के साथ ही कवि ने नीति व उपदेशपरक छंदों में लोक संचित अनुभवों को
काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। कवि के अनुसार कवि कर्म एक साधना है। कविता का जन्म अनायास होता है :-
कविता उतरे स्वयं ही, बिल्कुल परी समान।
स्वागत उसका मैं करूँ, जैसे प्रिय मेहमान।।
संग्रह की कुछ कुंडलियाँ विशुद्ध हास्य के साथ मनरंजन करती है। मूँछें, सुंदरियों का नमस्कार, पत्नी और प्रेयसि, पब्लिक
और प्रेमिका आदि कविताएँ हास्य की छटा बिखेरती नज़र आती है :-
मूँछे सबकी शान है, रखिये इनकी लाज
मूँछों की किस्में बहुत, अलग-अलग अंदाज़
अलग-अलग अंदाज, कुछ बर्छी तलवार सी
कुछ ऐंठी, कुछ उठीं, कुछ लम्बी पतवार सी
ईश्वर को प्रिय लगें, न माने सबसे पूछें
झड़ते सिर के बाल, पर झड़ें कभी न मूँछें।
भाव की भाँति प्रस्तुत कृति को शिल्प अत्यंत पुष्ट है। सहज, सरल और प्रांजल भाषा में रचे गए इन छंदों में गति, यति,
लय व मात्रा का पूर्ण निर्वहन किया गया है।
अनुभूति के वैशिष्ट्य को रेखांकित करती यह कृति दिनेश चन्द्र अवस्थी के सृजन को रूपायित करने में पूर्णतः सक्षम है।

भावांजलि-
वर्ष 2001 में कवि दिनेश चन्द्र अवस्थी जी की तीसरी काव्य कृति ‘भावांजलि’ का प्रकाशन सुलभ प्रकाशन लखनऊ द्वारा
हुआ। इस कृति में अवस्थी जी ने गीतिका विधा को अपना कर गीतिकाओं का प्रणयन करते हुए अपनी काव्यात्मक
प्रतिभा का परिचय दिया है। भावांजलि के गीतों में आध्यात्म, नैतिक-जीवन मूल्यों के साथ ही समसामयिक सन्दर्भ वर्णित
हैं। राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सरोकारों के साथ ही ईश्वर के प्रति आस्था, लोक मंगल की भावना और सात्विक भावभूमि

में रची गई ये रचनाएँ लोक-जीवन के नाना पहलुओं को दर्शाती है। वरिष्ठ साहित्यकार व प्रशासनिक अधिकारी विनोद
चन्द्र पाण्डेय ‘विनोद’ जी ने भावांजलि को एक सफल काव्य कृति मानते हुए लिखते हैं- ‘विषय की व्यापकता की दृष्टि से
रचना उच्च कोटि की है। गीतिकाओं में आध्यात्मिकता, नैतिकता, जीवन शैली, हास्य-व्यंग्य, सामाजिक विसंगति, सम
सामयिक सन्दर्भ, राष्ट्रीय भावना आदि के दृष्टान्त यत्र-तत्र उपलब्ध हैं।’
प्रस्तुत कृति में गीतों को आध्यात्मिक, नैतिक, जीवन दर्शन, हास्य-व्यंग्य शीर्षकों में विभाजित किया गया है। आध्यात्मिक
शीर्षक में कवि ने ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा प्रकट की है, साथ ही अविश्वास, पाप, दुष्कर्म, अपराध, माया-मोह, काम-क्रोध,
मद, लोभ आदि बुराइयों से दूर रहने का संदेश दिया है तथा सद्कर्मों के महत्व को प्रतिपादित किया है –
बना न कोई सूत्र अभी तक, जीने का।
है सुकर्म ही जीवन-फल, विश्वास करो।
‘नैतिक’ खंड में कवि मानव मात्र को अहंकार से दूर रहकर स्वाभिमान के साथ जीने की प्रेरणा देता हैं। कवि ने स्पष्ट
कहा है कि जीवन में समझदारी के साथ ईमानदारी, खुद्दारी का होना भी ज़रूरी है :-
जीने के लिए समझदारी जरूरी है
जीवन में सबके खुद्दारी ज़रूरी है।
गड्ढे में धँसा जा रहा समाज आज,
बचाने के लिए ईमानदारी जरूरी है।।
कवि का मानना है कि देश की वर्तमान परिस्थितियों में बदलाव लाना आवश्यक हो गया है। धर्म-जाति-भाषा और वर्ग
आदि की व्यर्थ के विवाद अब थमने चाहिए। देश के प्रति प्रेम की भावना सर्वोच्च है, यदि देश पर संकट के बादल छाए
हो तो सर्वस्व बलिदान करने के लिए जुनून होना चाहिए।
देश की हालत देखो, अब वह बदलनी चाहिए।
एकता की ही पताका, अब फहरनी चाहिए।
संकट में देश हो जब, इज्जत पे आँच आए।
बलिदान के लिए तब तबियत मचलनी चाहिए।
‘जीवन दर्शन’ खंड में जीवन के आदर्श-मूल्यों की महत्ता को प्रतिपादित करने का सफल प्रयास किया है। सुख-दुख जीवन
के दो पहलू हैं। इसलिए सुख के साथ ही दुःख सहने की क्षमता भी हममें होनी चाहिए –
हर एक सुख में दुख का आगमन है छिपा।
सुख भोगने से पहले दुख सहना सीख लो।
कवि ने जिंदगी का हल शीर्षक कविता में स्पष्ट किया है कि जीवन को सहज ढंग से जीने का सबसे अच्छा उपाय है कि
उसे कर्म करना चाहिए और समय की कीमत समझनी चाहिए –
कर्म करना जिंदगी का हल शायद
नहीं अच्छी और कोई गल शायद
काम अच्छा आज ही फौरन करो

नहीं आता जिन्दगी में कल शायद।
‘हास्य व्यंग्य’ शीर्षक खंड में कवि ने हास्य व व्यंग्य की चोट देते हुए बड़े ही खूबसूरत अंदाज में समय व समाज में
व्याप्त विसंगतियों की ओर इशारा किया है। आज लोग मतलबी और मक्कार हो चुके हें, पद और पैसे के आगे आदमी
बौना साबित हो रहा है। आज ईमान बिकाऊ है और आदमी की कीमत वस्तु से अधिक कुछ नहीं है। ‘ईमान बिकता है’
शीर्षक रचना में इसी भाव की सुन्दरतम अभिव्यक्ति हुई है-
आदमी का आज तो ईमान बिकता है
आदमी भी जिस तरह सामान बिकता है
आज पैसा सिर्फ पैसा यदि तुम्हारे पास
जैसा तुमको चाहिए फरमान बिकता है।
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ0 रामाश्रय सविता जी इस कृति के सम्बन्ध में लिखते हैं- ”श्री अवस्थी जी की इन गीतिकाओं में
आज का परिवेश, आज का आदमी, उसका आचार-विचार-व्यवहार, उसकी मनोवृत्ति, उसकी प्रवृत्ति, उसकी मानसिकता, अपने
उत्कटतम रूप में अभिव्यक्त हुई है। शब्द सरल है, सहज है, लेकिन व्यंग्य का रूप धारण कर उनमें बड़ी मारक क्षमता
उत्पन्न हो गई है। यह मार संहारक नहीं है, तिलमिला देने वाली है, आहत करने वाली है, सोचने को विवश करने वाली
है।”
इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि श्री दिनेश चन्द्र अवस्थीकृत काव्य कृति ‘भावांजलि’ विविध भावानुगामिनी,
आनंददायी, प्रतिकर कृति है। इसकी रचनाओं में भावपक्ष के साथ ही कलापक्ष का समन्वित रूप दृष्टिगोचर होता है। इन
गीतिकाओं का विषय फलक व्यापक और वैविध्यपूर्ण है, जिनको पढ़ते हुए पाठक जुड़ता चला जाता है।
व्यंग्य-बाण-
वर्ष 2014 में डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी की चौथी कृति के रूप में व्यंग्य-बाण का प्रकाशन पी.एम. पब्लिकेशन्स, नई
दिल्ली से हुआ। दोहा एवं कुंडलिया छन्द में रचित इस कृति में कवि की अधिकांश रचनाओं में समय व सामाजिक
व्यवस्था एवं दुर्व्यवस्था पर यथेष्ट चिंतन एवं समकालीन परिवेश में व्याप्त विसंगतियों का साहस के साथ उद्घाटन
किया गया है। वे घर, परिवार, न्यायिक प्रक्रिया, कार्यालय में व्याप्त भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी इत्यादि अनेक विषमताओं को
अपनी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं। कवि अपनी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का परिचय देते हुए इस जीवन व
जगत से जुड़ी छोटी से छोटी वस्तु की ओर ध्यानाकर्षित करते हैं और हास्य व्यंग्य के छोटे-छोटे तीर चलाते हुए अर्थ के
गाम्भीर्य को प्रकट करते हैं। प्रो0 सूर्य प्रसाद दीक्षित जी शुभाशंसा में इस कृति के प्रति अपने भाव प्रकट करते हुए लिखते
हैं-”कवि की दृष्टि कई छोटी-छोटी किन्तु महत्वपूर्ण समस्याओं की ओर गई है। उदाहरणार्थ दाल में कंकड़ स्तम्भ पठनीय
है। इस संकलन में अवस्थी जी ने एक नए रस की स्थापना की है, वह है झगड़ा रस। इस कृति का मूल स्वर हास्य एवं
व्यंग्य होते हुए भी समाज को दिशा बोध कराने वाली रचनाएँ संस्कार परिष्करण में सहायक हैं एवं संदेश भी देती हैं।’
प्रस्तुत कृति में पारिवारिक, सामाजिक, भ्रष्टाचारिता,अवसरवादिता, राजनीतिक, कार्यालयीय, न्यायालयीय, कवि और कविता,
नीति व्यवहार, ईश्वर, धर्म, दर्शन, उपदेशात्मक तथा विविध शीर्षकों से रचनाओं का विभाजन किया गया है। अधिकांश
भावाभिव्यक्ति का माध्यम दोहा छंद है। साथ ही मूँछें, सुन्दरियों का नमस्कार, पत्नी और प्रेमिका, कविता और चिकित्सा,
बेशर्मी, चुनाव, राजनीति, इत्यादि शीर्षक रचनाएं कुंडलिया छंद में रचित हैं। संग्रह में एक मात्र गीतिका संग्रहीत है। संग्रह
की रचनाएँ घर कार्यालय और रोजमर्रा के कार्यां के सम्बन्ध में मिलने-जुलने वाले लोग, प्रेम, छल या दैन्य जीवन की
समस्याओं से सम्बन्धित हैं, जिन्हें कवि ने हास्य एवं व्यंग्य के सहारे अत्यंत प्रभावपूर्ण बना दिया है। कवि ने आत्म-
कथ्य में स्पष्ट किया है कि ”मेरे विचार से जीवन में निराशा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। समाज में अनेक संघर्षों

और धोखे खाने के बावजूद न तो मैं निराश हुआ और न सबको खराब समझने की प्रवृत्ति मुझमें विकसित हो पाई। जहाँ
तक संभव हो दुखी रहने के बजाय उस ऊर्जा का इस्तेमाल अपने कर्म और धर्म में रत रहकर करना चाहिए। मैं ऐसा ही
करने का प्रयास करता रहा हूँ।”
इसी सकारात्मक सोच, प्रवृत्ति व स्वभाव की झाँकी संग्रह की रचनाओं में दृष्टिगोचर होती है। आज समाज में अतिथि देवो
भव की परम्परा दिखाई नहीं पड़ती है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। इसी भाव को प्रकट करता यह दोहा दृष्टव्य है –
गिन, गिन कर रोटी सिकें, पाए श्वान न गाय।
मुझको हरदम डर लगे, अतिथि न घर आ जाए।।
स्वार्थपरता, असन्तोष सर्वत्र व्याप्त है। कवि मन सामाजिक विकृतियों को देखकर आहत होता है। उसका मानना है :-
आज बढ़ा है स्वार्थ अति, नहीं किसी को सब्र।
हवस ठसा-ठस भरी है, पाँव घुसे हैं कब्र।।
कवि के कुछ दोहों में तकनीकी शब्दों का अच्छा प्रयोग हुआ है, वे भावों को अर्थवत्ता प्रदान करते हैं। एक उदाहरण दृष्टव्य
है –
व्यक्ति-व्यक्ति में अलग है, भरा हुआ प्रोग्राम।
हार्डवेयर सब अंग है, कम्प्यूटर सा चाम।।
क्वि ने अपने दोहों के माध्यम से सकारात्मक संदेश प्रदान करने का प्रयास किया है। कवि का मानना है कि समय
कितना भी बुरा हो, हमें घबड़ाना नहीं चाहिए, क्योंकि वह समय जैसे ही आता है, वैसे ही वापस चला जाता है –
कठिन समय में भी कभी, न ज्यादा घबड़ाय।
जैसे आता है समय, वैसे चलकर जाय।।
हम सब ईश्वर के हाथ की कठपुतली हैं जिसकी डोर स्वयं ईश्वर के हाथ में है। वह जैसे चाहता है वैसे ही नचाता है। इस
कथ्य की कवि ने बड़े ही रोचक ढंग से अभिव्यक्ति दी है –
दुनिया के सब जीव हैं, स्वतः चलित रोबोट।
ईश्वर ने प्रोग्राम भर, पकड़ा स्वयं रिमोट।।
कथ्य के समान ही कृति का शिल्प विधान भी अत्यंत प्रभावपूर्ण है। सहज, सरल, व्यावहारिक हिन्दी में रचित ये दोहे जन-
मन रंजन करने के साथ ही संदेशपरक हैं। कवि ने आम-बोलचाल की भाषा में प्रयुक्त होने वाले उर्दू, अरबी, फारसी के
साथ ही प्रचलित अंग्रेजी शब्दों का सहज प्रयोग किया है जिससे दोहों की सम्प्रेषणीयता व सहजता बढ़ गई है। कहीं-कहीं
श्लिष्टत्व प्रयोग से काव्य में चमत्कार की सृष्टि हुई है। यथा :-
अफ़सर बिजली एक से, दोनों मारें शॉक।
अर्थिंग इनकी कीजिए, काम करें बेबाक।।
अफ़सर व बिजली के लिए अर्थिंग शब्द के प्रयोग से श्लिष्टत्व की उत्पत्ति हुई है।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि कृति की रचनाएँ कवि के गहन चिंतन-मनन, अनुभव और संवेदना की तरलता से
उपजी है। इनमें प्रबोधक-नीति के साथ कवित्व के गुण विद्यमान हैं। दोहा छंद में अर्थ के सागर को भरने में कवि सफल
सिद्ध हुआ है। डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी दोहों के माध्यम से आँखिन देखी लिखने और रचने वाले बेजोड़ रचनाकार है।
दोहा वल्लरी-
वर्ष 2021 में डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी की पाँचवीं काव्य-कृति ‘दोहा वल्लरी’ शीर्षक से ज्ञान, विज्ञान, एजूकेयर, नई
दिल्ली से प्रकाशित हुई। इस कृति के 16 उपशीर्षक जिनके नाम कृमशः नमन/दर्शन, परिवार, मानव जीवन, नीति/
व्यवहार,स्नेह/ प्रेम/ मित्रता,उपदेश/ परामर्श,संबंध, समाज/ एकता, कष्ट/संर्घर्ष, कवि/ कविता, कार्यालय-संस्कृति, भ्रष्टाचार,
मनोविकार, राजनीति/ देशभक्ति, व्यंग्य एवं विविध है, में कवि के दोहे संग्रहीत हैं तथा अंतिम अध्याय में कुंडलियाँ छंद
और एक गीतिका संगहीत है।
कवि की अन्य कृतियों के समान ही यह कृति भी समकालीन हिन्दी कविता के यथार्थ रूपों व उसकी संवेदना को प्रकट
करने में सक्षम है। वरिष्ठ कवि श्री जयशंकर मिश्र जी कृति की भूमिका में लिखते हैं कि ”डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी
की प्रस्तुत काव्य-कृति दोहा वल्लरी, मानव जीवन के सुख, दुख, उतार, चढ़ाव की केवल प्रत्यक्ष साक्षी ही नहीं है, वरन्
वर्तमान समाज की प्रवृत्तियाँ, स्वार्थपरता की पराकाष्ठा, पारिवारिक स्नेह एवं आदर की भावनाओं का तीव्र रूप में हो रहा
ह्रास, समाज के हर वर्ग में व्याप्त छल, कपट, ईर्ष्या, द्वेष का बाहुल्य, शील-सद्भाव, आदर-सत्कार तथा समरसता इत्यादि के
अभाव पर भी गहरी चोट देते हुए दोहा का एक अनूठा संकलन है। इन रचनाओं में कवि श्री अवस्थी जी का स्वयं का
चिंतन, सुदीर्घ शासकीय, व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में सत्य, निष्ठा एवं शुचिता के प्रति तीव्र रुझान एवं इससे
अन्यथा स्थितियों पर इनकी चिंता तथा आक्रोश प्रभावी रूप में परिलक्षित होता है।”
कविवर डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी पारंपरिक छन्दों में निष्णात हैं परन्तु दोहा व कुंडलिया छंद आपके प्रिय छंद रहे हैं।
इसलिए भावाभिव्यक्ति के लिए आपने प्रायः इन्हीं दो छंदों को माध्यम बनाया है। कवि का मानना है कि दोहा अपने
छोटे से कलेवर में गूढ़ भाव व अर्थ को संजोए रहता है। इस कृति की भूमिका में कवि ने दोहों के भेद-विभेद पर प्रकाश
डाला है, ताकि नए साहित्यकार दोहों में मात्रिक गणों के प्रयोग से अवगत हो सकें।
प्रस्तुत कृति के वर्ण्य विषय प्रकृति, समाज, मनुष्य व उनकी मनोवृत्तियाँ हैं, वे व्यक्तिगत से लेकर विश्वजनीन घटनाओं का
सूक्ष्म निरूपण इन रचनाओं में करते हैं। ईश्वर, धर्म, दर्शन, परिवार, पत्नी, बच्चे, माता-पिता, घर-गली, शहर, कार्यालय, पशु-
पक्षी, देशभक्ति, के साथ समाज विकृतियाँ यथा आतंक, अवसरवादिता, मक्कारी, भ्रष्टाचार को भी अपनी चिंतन की परिधि
में समेटते हैं।
कवि ने मंगलाचरण के रूप में दोहा प्रथम पूज्य गणेश जी को समर्पित किया है :-
अर्पित है दोहा प्रथम, तुमको पूज्य गणेश।
सुंदर सी पुस्तक बने, विनती करें दिनेश।।
कहीं-कहीं इन दोहों में पैने व्यंग्य के स्वर मिलते हैं। कार्यालय संस्कृति का एक बिम्ब इस दोहे में दृष्टव्य है :-
करते हो यदि नौकरी, उसके लो गुण जान।
कुरसी पर जो भी दिखे, उसको कहो महान।।
इसी प्रकार वर्तमान राजनीतिक परिवेश का यथार्थ चित्रण निम्नलिखित दोहे में दृष्टिगोचर होता है :-
बड़े-बड़े नेता सभी, होते जैसे पेड़।

जुड़ी रहें अंदर जड़ें, ऊपर से मुठभेड़।।
हमारे आपस में परस्पर सम्बन्ध कैसे होने चाहिए, इसकी सहज अभिव्यक्ति इस दोहे में दर्शनीय है :-
घड़ी सुइयों सम रखे, अपनों से सम्बन्ध।
दूर-दूर चाहे दिखें, जड़ से हो अनुबंध।।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि कवि अवस्थी जी के दोहे अभिधा की नींव पर प्रतिष्ठित होते हुए भी लाक्षणिकता के
सोपानों पर आरूढ़ होते हुए व्यंजना की ऊँचाइयों को सहज संस्पर्श करते हैं। प्रभावमयी, भावानुगामिनी, भाषा, रस, लय, यति,
गति, इत्यादि की दृष्टि से प्रस्तुत कृति भावाभिव्यक्तियों का उत्कृष्ट संग्रह है।
प्रकाशनाधीन कृति : दिनेश दोहावली
यह कृति कवि के श्रेष्ठ दोहों का संचयन है, जिसमें पूर्व प्रकाशित कृतियों से चयनित श्रेष्ठ दोहों को शामिल किया गया है,
साथ ही अनेक सर्वथा नवीन व अप्रकाशित दोहें भी संग्रहीत है।दोहा कवि का सर्वप्रिय छंद है, वे आत्म कथ्य में लिखते है-
‘‘मुझे दोहा छंद अत्यन्त प्रिय है और मैं काफी समय से दोहे लिख रहा हूँ। मुझे महसूस होता रहा कि मैं अभी इससे
अच्छा लिख सकता हूँ, यही एहसास मुझे दिनेश दोहावली तक खींच लाया जो आपके हाथों में है।
अवस्थी जी ने विषयों के आधार पर दोहों को परिवार, भक्ति/दर्शन मानव जीवन, नीति/व्यवहार, प्रेम/मित्रता, उपदेश/परामर्श
संबन्ध, समाज/सामाजिक एकता, कष्ट/श्रम/संघर्ष कवि/कविता, कार्यालय-संस्कृति, मनोविकार/भृष्टाचार राजनीति/देशभक्ति,
व्यंग्य, तथा विविध अध्यानों में विभाजित किया है।
प्रस्तुत कृति में माँ को रूपायित करने वाला तथा अन्स्तल को संस्पर्श करने वाले दोहो संग्रहीत हैं। माँ परिवार की रीढ़ है
उसकी परिवार के प्रति भूमिका और दायित्व निर्वचनीन है। उसके हृदय में संतान के प्रति वात्सल्य का अक्षय स्त्रोत
प्रवहमान है। माँ को पुत्र के प्रति वात्सलय प्रकट करता यह दोहा प्रसून्य है-
माँ जब लिखिए तो लगे, एक चन्द्र इक-बिन्दु
लेट बच्चा बिन्दु है, माँ की गोरी-इन्द्र।
कवि ने इस कृति में माँ के प्रति अनेक हृदयग्राही दोहे रचे है, माँ के साथ ही पत्नी के प्रति विविध भावों को जीवन के
विभिन्न अनुभवों के आधार पर व्यक्त किया है। भारतीय समाज में स्त्री को पत्र नार्परन्तु पूज्यंते, रमन्तें तत्र देवताः
कहकर सम्मान दिया गया है। सम्मान का यह भाव कवि के दोहों में भी विद्यमान है परंतु शैली की रोचकता मन को
गुदगुदाती है-
पत्नी है अर्द्धागिनी, बिन पत्नी सब सून
पत्नी बिना न मन लगे घर या देहरादून।
अवस्थी जी सिद्धहस्त दोहा कार है। इसीलिए किसी कथ्य को, जो वह अभिव्यक्त करना चाहते है। उसे पूर्णता के साथ
दोहो में ढाल लेते है। मानवीय सम्बंधो की दुविधाओ विषमताओ और अभावों को अनुगूंज इन दोहो में सुनी जा सकती है।
कभी ये दोहे मन को आकुल व्याकुल करते है तो तभी इन दोहो को पढ़ते हुए हास्य व व्यंग्य की फुहारों से सिंचित हो
मन आहूलादित हो उठता है। आम बोल चाल की भाषा में कह गए थे दोहो सहज, सरस व सम्प्रेषणीय हें समय के महत्तव
को दर्शाता यह दोहो देखिए-
टिक-टिक-कहती घड़ी की, पल न करो बेकार

जीवन तरु पर हर समय, करे कुल्हाड़ी धार।।
समय कभी रुकता नही है, जिस प्रकार कुल्हाड़ी के निरन्तर वार से तरु का जीवन समाप्त होता है, उसी प्रकार माव जीवन
भी समय की मार पड़ती रहती है।
कवि ने नीति व्यवहार सम्बन्धी अनेक दोहे रचे है। ज्यो कवि के नैसर्गिक चिंतन के साथ-साथ मौलिक प्रतिभा को
उद्वघाटित करते है।।
हैं सुगन्ध सा आचरण, सोने सा है ज्ञान
ये दोनों मिल जाए जब, तब मिलता सम्मान।
समाज में सम्मान पाने के लिए व्यक्ति को ज्ञानवाच होने के साथ-साथ सदाचारी हेना चाहिए।
कवि की दृष्टि में शक्ति विचारों में होनी चाहिए। जिस प्रका वर्षा का जल फसल के लिए लाभकारी होता है। जब कि बाढ़
से फसल नष्ट हो जाती है-
शक्ति विचारों में रखो, तेज न हो आवाज।
वर्षा से उपजे फसल, बाढ़ गिराए गाज।।
कवि की रचना शीलता में संवेदना एवं चमत्कारिकता विद्यमान हैं उनका चिंतन सामाजिक सरोकारों के प्रति सर्वध सचेत
हैं इसीलिए सार्थक विचारों का मंथन करती हुई उनकी लेखनी दोहों जैसे छंद में भाव गाम्भीर्थ को भर देने में समथ्र है।
चींटी से श्रम सीखिए औ बगुले से युक्ति।
मकड़ी से कारीगरी, चातक से अनुशक्ति।।
इस संग्रह में अनेक ऐसे दोहे है जो कवि की निजी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है, फिर भी उससे जुड़कर निज यथार्थ का
अनुभव करता है, यही इन दोहों की सार्थकता है।
अग्रेतर साहित्य
एहसास की खुशबू-वर्ष 2010 में प्रकाशित रचना ‘एहसास की खूशबू’ कविवर दिनेश चन्द्र अवस्थी की मौलिक कृति
भावांजलि की रचनाओं फारसी लिपि लिप्यांतरित कविताओं का संग्रह है।
कवि प्रदीप का साहित्यिक अवदान-वर्ष 2012 में भारत बुक सेंटर से डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी की एक महत्वपूर्ण कृति का
प्रकाशन हुआ। यह कृति अवस्थी जी का शोध प्रबन्ध है। यह एक आम धारणा है कि फिल्मी गीत साहित्य की श्रेणी में
नहीं आते। कवि ने इस धारणा के विपरीत सिने जगत के सुप्रसिद्ध गीतकार कवि प्रदीप पर शोध कार्य सम्पन्न किया
और कवि प्रदीप के अवदान को भारतीय सैद्धान्तिक सूत्र-ग्रंथों, साहित्यालोचन के पाश्चात्य मानदण्डों की कसौटियों पर
कस कर उसे साहित्यिक रूप से प्रतिष्ठित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। अपने शोध के उद्देश्य को प्रकट करते हुए
अवस्थी जी आत्मनिवेदन में लिखते हैं –
‘’इस ग्रंथ का उद्देश्य कवि प्रदीप के देशभक्ति,आध्यात्मदर्शन एवं सामाजिक भावभूमि पर आधारित श्रेष्ठ सिने गीतों से
समाज और साहित्य प्रेमियों को परिचित कराना तथा कवि प्रदीप को साहित्यकार के रूप में स्थापित करना है।”
प्रस्तुत कृति को 12 अध्यायों में विभाजित किया गया है। प्रारम्भ के अध्यायों क्रमशः भूमिका, कवि प्रदीप का जीवन
परिचय और उनकी फिल्मेतर रचनाएँ, कवि प्रदीप के गीतों में वस्तु-तत्व, कवि प्रदीप के गीतों में मानवतावाद और
सामाजवादी चेतना, कवि प्रदीप के गीतों में रूमानियत और स्वच्छंदतावादी तत्व, कवि प्रदीप के गीतों का शिल्पगत

अध्ययन, कवि प्रदीप का हिन्दी साहित्य में अवदान में कवि प्रदीप के अवदान का समीक्षात्मक विवेचन है तथा कवि
प्रदीप का रचना संसार, में कवि के महत्वपूर्ण गीत संग्रहीत है। साथ ही कवि प्रदीप द्वारा लिखे गए फिल्मी गीतों की
सूची परिशिष्ट-1 के रूप में सम्मिलित की गई है।
संक्षेप में यह कृति कवि प्रदीप के जीवन संघर्ष तथा फिल्मी सफ़र, उनके अवदान के साहित्यिक महत्व को प्रकट करने के
सन्दर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है।
संपादित कृतियाँ-

  1. आस्था के स्वर – (अभिनंदन ग्रंथ) केशरी नाथ त्रिपाठी अभिनंदन गं्रथ समिति, लखनऊ द्वारा वर्ष 2007 में उत्तर
    प्रदेश के जन प्रतिनिधि, पूर्व विधान सभा अध्यक्ष पं0 केशरीनाथ त्रिपाठी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर आधारित एक विशद
    अभिप्रेत ग्रंथ का प्रकाशन किया गया। इस ग्रंथ के प्रबन्ध सम्पादक डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी हुए। इस ग्रंथ में 83
    गणमान्य महानुभावों व श्रेष्ठ साहित्यकारों के माननीय श्री त्रिपाठी जी के प्रति उद्गार संकलित किए गए हैं। त्रिपाठी जी
    के प्रति अवस्थी जी के उद्गार दृष्टव्य हैं :-
    केशरी नाथ त्रिपाठी! तुम्हें मेरा प्रणाम-
    अवढर दानी शम्भु सम, अमर रहेगा नाम
    अमर रहेगा नाम, निभाई पद की गरिमा
    और विधिक इतिहास, लिखेगा पुनि-पुनि महिमा
    परहित में नित निरत, लिए दधीचि सी काठी
    राजनीति में कमल, केशरी नाथ त्रिपाठी।
  2. विनोद चन्द्र पाण्डेय ‘विनोद’ अभिनन्दन ग्रंथ- यह कृति वर्ष 2013 में भारत बुक सेंटर, लखनऊ से प्रकाशित है। जो कि
    प्रशासनिक अधिकारी एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ0 विनोद चन्द्र पाण्डेय ‘विनोद’ जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को उद्भासित
    करती है तथा उनके परिचित, सहकर्मियों एवं साहित्यकारों के विचारों को संग्रहीत कर डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी के संपादन
    में इस महत्वपूर्ण कृति का प्रकाशन किया गया। डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी ने इस ग्रंथ में श्री विनोद चन्द्र पाण्डेय
    ‘विनोद’ जी के परिचितों, सहकर्मियों एवं साहित्यकारों के विचारों को संग्रहीत कर अथक् परिश्रम से उसका संपादन व
    प्रकाशन कराया।
  3. पद्यात्मक सूक्ति कोष- संवेदनशील सर्जक होने के साथ ही डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी जी एक गंभीर अध्येता भी हैं।
    अवस्थी जी ने विभिन्न अवसरों व सन्दर्भों के प्रति कहीं गई महासंतों, कवियों, शायरों इत्यादि के पद्यात्मक कथनों को
    अपने अथक् परिश्रम से, लगनशीलता व श्रम से संकलित किया, जिसे वर्ष 2019 में आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली द्वारा
    प्रकाशित किया गया। इस कृति के माध्यम से कवि ने पद्यात्मक सूक्तियों का श्रेष्ठ संचयन कर उसे जन-जन तक
    सुलभ कराने का महनीय कार्य किया है।
    सूक्ति को परिभाषित करते हुए अवस्थी जी लिखते हैं-
    ”सूक्ति शब्द का आशय है सुन्दर कथन, सुन्दर वाक्य, सुन्दर पद्य, कवित्वमय वचन, सुन्दर रूप से कथित, विशिष्ट वाक्य,
    चमत्कारपूर्ण वाक्य या पद आदि। उक्त अर्थानुसार सूक्ति के अन्तर्गत उपदेश, नीति, चमत्कार रूप से कहा गया कथन,
    सूचनात्मक वाक्य, अनुभवों को समेटे हुए प्रेरणादायी वाक्य एवं मनोरंजक व उपयोगी कथन भी आते हैं।’8
    सफलता के सन्दर्भ में प्रस्तुत कृति में संग्रहीत कवि की निम्न पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं –

मुझे ऊँचाइयों पर देखकर हैरान हैं बहुत लोग,
पर किसी ने मेरे पैरों के छाले नहीं देखे।।
प्रस्तुत कृति में वर्णात्मक क्रम में विविध विषयों पर आधारित सूक्तियाँ संग्रहीत हैं। वर्तमान में अवसरवादी होना सफलता
की कुंजी है। एक उदाहरण देखिए –
रहे फायदे में सदा, अवसरवादी लोग।
गिरगिट का सा रंग बदल, करते सुविधा भोग।।
इसी प्रकार ‘वक्त’ पर लिखी गई रघुविंद यादव की ये पंक्तियाँ ध्यानाकर्षित करती हूँ –
वक्त खेलता है सदा, अजब अनोखे खेल।
कल पटरी थी रेल पर, अब पटरी पर रेल।।
स्ंक्षेप में अवस्थी जी द्वारा संपादित कृति ‘पद्यात्मक सूक्ति कोष’ काव्य रसिकों तथा हिन्दुस्तानी पाठकों के लिए
अमूल्य है तथा अपनी विशदता व व्यापकता में ऐतिहासिक महत्व रखती है।
4. अपरिहार्य-राज्य कर्मचारी साहित्य संस्थान, उ0प्र0 द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका अपरिहार्य का वर्ष 2001 से
अनवरत नियमित प्रकाशन डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी के संरक्षण में हो रहा है।
सारांशतः हम कह सकते हैं कि हिन्दी साहित्य भाषा के संवर्द्धन व संरक्षण में डॉ0 दिनेश चन्द्र अवस्थी का योगदान
अप्रतिम है। उन्होंने हिन्दी भाषा व साहित्य को प्रतिष्ठित करने, राज्यकर्मी एवं साहित्यकारों के अवदान को सम्मानित
स्थान दिलाने के लिए जो प्रयत्न किए, उसका अक्षय आलोक कभी मंद न होगा। कहा जाता है :-
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृति सिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।
अर्थात विपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध (संघर्ष) में पराक्रम, यश में अभिरुचि और शास्त्रों के पठन-
पाठन में व्यसन ये महापुरुषों के स्वाभाविक गुण हैं। शास्त्रों में वर्णित महापुरुषों के उपर्युक्त सभी गुण डॉ0 दिनेश चन्द्र
अवस्थी जी के व्यक्तित्व व कृतित्व में विद्यमान हैं। श्रेष्ठ, उदारमना, संवेदनशील, शब्द ब्रह्म के साधक डॉ0 अवस्थी जी
का हम वंदन करते हैं, अभिनंदन करते हैं।

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