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संजय कुमार सिंह

शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण चतुर्दशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी नरक चतुर्दशीके नामसे पहचानी जाती है । भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुरको उसके अंत समय दिए वरके अनुसार इस दिन सूर्योदयसे पूर्व जो अभ्यंगस्नान करता है, उसे नरकयातना नहीं भुगतनी पडती । अभ्यंगस्नान अर्थात सुगंधित तेल एवं उबटन लगाकर किया गया स्नान । बलिप्रतिपदाके दिन भी प्रातः अभ्यंगस्नानके उपरांत सुहागिनें अपने पतिकी आरती उतारती हैं ।

नरकचतुर्दशी का महत्त्व एवं अभ्यंगस्नान की अध्यात्मशास्त्रीय जानकारी
शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण चतुर्दशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी नरक चतुर्दशी के नामसे जानते हैं । इस तिथि के नाम का इतिहास इस प्रकार है –

‘पूर्वकाल में प्राग्ज्योतिषपुर में भौमासुर नामक एक बलशाली असुर राज्य करता था । उसका एक अन्य नाम भी था – नरकासुर । यह दुष्ट दैत्य देवताओं और पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों को भी अत्यंत कष्ट देने लगा । जीतकर लाई हुई सोलह सहस्र राज्यकन्याओं को उसने बंदी बनाकर उनसे विवाह करने का निश्चय किया । सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गई । यह समाचार मिलते ही भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामासहित उस असुरपर आक्रमण किया । नरकासुर का अंत कर सर्व राजकन्याओं को मुक्त किया । वह दिन था शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण चतुर्दशी अर्थात विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण चतुर्दशीका । तबसे यह दिन नरकचतुर्दशी के नामसे मनाते हैं ।’

अभ्यंगस्नान का महत्त्व
मरते समय नरकासुर ने भगवान श्रीकृष्णसे वर मांगा, कि ‘आजके दिन मंगलस्नान करनेवाला नरककी यातनाओंसे बच जाए ।’ तदनुसार भगवान श्रीकृष्णने उसे वर दिया । इसलिए इस दिन सूर्योदयसे पूर्व अभ्यंगस्नान करनेकी प्रथा है । भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुरको दिए गए वरके अनुसार इस दिन सूर्योदय से पूर्व जो अभ्यंगस्नान करता है, उसे नरकयातना नहीं भुगतनी पडती ।

दीपावली के दिनों में अभ्यंगस्नान करनेसे व्यक्ति को अन्य दिनों की तुलना में ६ प्रतिशत सात्त्विकता अधिक प्राप्त होती है । सुगंधित तेल एवं उबटन लगाकर शरीर का मर्दन कर अभ्यंगस्नान करने के कारण व्यक्तिमें सात्त्विकता एवं तेज बढता है । नरकचतुर्दशी के दिन अभ्यंगस्नान करने से शक्ति का २ प्रतिशत, चैतन्य का ३ प्रतिशत, आनंद का १ दशमलव पच्चीस प्रतिशत एवं ईश्वरीय तत्त्व का १ प्रतिशत मात्रा में लाभ मिलता है ।

इस दिन सूर्योदयसे पहले उबटन लगाकर, शरीरकी मैल उतारें एवं स्नान करें । घरद्वार व दुकानको स्वच्छ कर, रंगोली सजाकर, उसमें रंग भरकर आंगन सुशोभित करें । परंतु यह सर्व बाह्य रूपसे ही है । मनकी मैल, बुरे विचार दूर करनेकी बात सूझती भी नहीं । बुरे विचारोंके कारण समाजमें दूषित वातावरण निर्माण होता है । यहां-वहां कूडा- कचरा, प्रदूषणसे स्वास्थ्यपर अनिष्ट परिणाम होता है । इस प्रकार नरक समान स्थिति हो जाती है । ऐसेमें समाजसे बुरे विचारोंकी मलिनता हटानेके लिए, अपने हाथमें ज्ञानरूपी झाड़ू उठानेसे ही स्वच्छता होती है ।

इसीलिए सीमित अवधितक प्रसन्न दिखाई देनेवाला वातावरण, सदाके लिए प्रदूषित रहता है । जबतक मनकी मलिनता नहीं निकलती एवं उसके स्थानपर दैवी विचारोंकी स्थापना नहीं होती, तबतक नरकचतुर्दशीका महत्त्व नहीं समझमें आता । संक्षेपमें, नरकचतुर्दशी कहती है, `बुरी वृत्तिको जडसे मिटा दो । दुर्गंधको दूर करो, तब ही हम खरे अर्थसे दीपावली मना पाएंगे ।

नरकचतुर्दशी के दिन प्रात: अलक्ष्मी का मर्दन कर अपनेमें नरकरूपी पापवासनाओं का समूल नाश कर, अहंकार का उच्चाटन करना चाहिए । तब ही आत्मापर पडा अहं का पट अर्थात परदा हटेगा और आत्मज्योत प्रकाशित होगी । इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया ।

इसका अर्थ है, दुर्जन शक्तिपर सज्जन शक्ति की विजय ।’ जिस समय सज्जन शक्ति जागृत होती है और वह संगठितरूप से कार्य करने लगती है, तब दुर्जन शक्ति निष्प्रभावी बनती है । प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में आसुरीवृत्ति एवं विघातकवृत्ति को घटाकर, उसके स्थानपर दैवी वृत्ति की स्थापना करे । आगे इसका परिणाम समाजपर होता है और फिर राष्ट्रपर ।’ इसलिए सज्जन संगठित होकर अपने ज्ञान से समाजको लाभान्वित करें । यही इस नरकचतुर्दशी से स्पष्ट होता है ।

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