Spread the love

सी एम जैन

कल्पना कीजिए कि आप अपनी मोटरसाइकिल पर अपने परिवार के साथ सड़क पर जा रहे हैं। पीछे से कोई व्यक्ति आवाज़ लगाता है—”भाई साहब, टायर पंचर होने वाला है!” आप तुरंत गाड़ी रोकेंगे। उतरकर टायर देखेंगे। समस्या की पुष्टि करेंगे और उसे ठीक करवाने की कोशिश करेंगे। आप यह नहीं कहेंगे कि जिसने सूचना दी है, वही अब आपकी मोटरसाइकिल भी ठीक करवाए, पंचर वाले को भी ढूंढ़े, पैसे भी दे और आपको घर तक भी छोड़कर आए। ” सूचना देने वाले ने अपना काम कर दिया। उसने खतरे की ओर आपका ध्यान खींच दिया। अब आगे की जिम्मेदारी आपकी है, क्योंकि नुकसान आपका है और यात्रा भी आपकी।

अब एक और दृश्य सोचिए। कोई राहगीर आपको बताता है कि आपकी मोटरसाइकिल से पेट्रोल चुराया जा रहा है। क्या आप आराम से खड़े होकर उससे कहेंगे—”अच्छा, आपने देख लिया है तो अब आप ही चोर को पकड़िए, पुलिस में शिकायत करिए, अदालत जाइए और मुझे परिणाम बताइए”? बिल्कुल नहीं। क्योंकि आप जानते हैं कि नुकसान आपका है, मोटरसाइकिल आपकी है, पेट्रोल आपका है और अंततः जिम्मेदारी भी आपकी ही है।

यहीं एक ऐसा विरोधाभास छिपा है जिस पर शायद भारतीय समाज ने कभी गंभीरता से विचार नहीं किया। जब बात हमारी निजी संपत्ति की होती है, तो हम तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। लेकिन जब बात हमारे सार्वजनिक जीवन, हमारे अधिकारों, हमारे पैसे, हमारी संस्थाओं, हमारे लोकतंत्र और हमारे भविष्य की होती है, तब हम अचानक दर्शक बन जाते हैं।

यहीं से समस्या शुरू होती है। जब कोई पत्रकार किसी घोटाले का खुलासा करता है, जब कोई मीडिया संस्थान किसी भ्रष्टाचार को उजागर करता है, जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता किसी अन्याय की ओर ध्यान आकर्षित करता है, जब कोई नागरिक सूचना के अधिकार के माध्यम से तथ्य सामने लाता है, तब समाज का एक बड़ा हिस्सा यह मानकर बैठ जाता है कि अब आगे की पूरी लड़ाई भी वही लोग लड़ेंगे।

खबर पढ़ ली। वीडियो देख लिया। पोस्ट साझा कर दी। गुस्सा व्यक्त कर दिया। और फिर जिम्मेदारी समाप्त।

मानो पत्रकार का काम केवल सूचना देना नहीं, बल्कि जांच करना, शिकायत करना, कानूनी लड़ाई लड़ना, दबाव बनाना, परिणाम लाना और व्यवस्था बदलना भी हो। यह सोच जितनी सामान्य है, उतनी ही खतरनाक भी।

क्योंकि पत्रकार, मीडिया या कोई भी जागरूक नागरिक डॉक्टर की तरह है जो बीमारी की पहचान करता है। लेकिन यदि मरीज दवा खाने से ही इंकार कर दे, तो डॉक्टर क्या कर सकता है? सड़क पर खड़ा व्यक्ति आपको यह बता सकता है कि टायर पंचर है, लेकिन वह आपकी जगह टायर नहीं बदल सकता। वह आपको आगाह कर सकता है कि पेट्रोल चोरी हो रहा है, लेकिन आपकी मोटरसाइकिल की रक्षा का अंतिम दायित्व उसी का नहीं हो सकता।

लोकतंत्र में भी यही सिद्धांत लागू होता है। पत्रकार का काम सूचना देना है। नागरिक का काम प्रतिक्रिया देना है। पत्रकार का काम खतरे की घंटी बजाना है। समाज का काम उस घंटी को सुनना है। पत्रकार का काम अंधेरे में टॉर्च जलाना है। चलना नागरिकों को ही पड़ता है।

लेकिन हमने धीरे-धीरे लोकतंत्र को एक अजीब व्यवस्था में बदल दिया है, जहाँ जनता खुद को दर्शक और कुछ लोगों को स्थायी योद्धा मान बैठी है। हम चाहते हैं कि कोई और सवाल पूछे, कोई और लड़ाई लड़े, कोई और जोखिम उठाए, कोई और दस्तावेज़ जुटाए, कोई और शिकायत करे, कोई और अदालत जाए और अंत में कोई और हमें तैयार परिणाम लाकर दे।

यही वह मानसिकता है जिसने नागरिक को सहभागी से उपभोक्ता बना दिया है। हम समाचारों का उपभोग करते हैं, नागरिकता का अभ्यास नहीं। यही कारण है कि कई बड़े खुलासे कुछ दिनों की चर्चा बनकर रह जाते हैं। तथ्य सामने आ जाते हैं, लेकिन समाज आगे नहीं बढ़ता। क्योंकि सूचना तो पहुंचती है, जिम्मेदारी नहीं पहुंचती।

कल्पना कीजिए, यदि किसी शहर में दस हजार लोग किसी घोटाले की खबर पढ़ते हैं और उनमें से केवल सौ लोग भी संबंधित विभाग को पत्र लिख दें, सूचना का अधिकार आवेदन लगा दें, जनप्रतिनिधियों से जवाब मांग लें, वैधानिक शिकायत दर्ज कर दें या संस्थागत कार्रवाई की मांग करें, तो स्थिति कितनी बदल सकती है। लेकिन अक्सर होता यह है कि दस हजार लोग खबर पढ़ते हैं और दस हजार लोग इंतजार करते हैं कि कोई और कुछ करेगा।

यह केवल निष्क्रियता नहीं है। यह लोकतंत्र की सबसे महंगी गलतफहमी है। क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक ग्राहक नहीं होता। वह हिस्सेदार होता है। और हिस्सेदार का पहला कर्तव्य यह है कि जब उसे नुकसान की सूचना मिले, तो वह स्वयं सक्रिय हो।

यदि कोई पत्रकार आपको बता रहा है कि सार्वजनिक धन का दुरुपयोग हुआ है, तो वह वास्तव में आपको यह बता रहा है कि आपकी जेब से निकला पैसा खतरे में है। यदि कोई मीडिया संस्थान किसी अन्याय को उजागर कर रहा है, तो वह आपको बता रहा है कि आपके अधिकारों की दीवार में दरार पड़ रही है। यदि कोई सामाजिक कार्यकर्ता किसी भ्रष्टाचार का पर्दाफाश कर रहा है, तो वह आपको चेतावनी दे रहा है कि जिस व्यवस्था पर आपका भविष्य टिका है, उसमें समस्या पैदा हो रही है।

सवाल यह नहीं है कि पत्रकार ने क्या किया। सवाल यह है कि सूचना मिलने के बाद नागरिक ने क्या किया। क्योंकि इतिहास में किसी भी समाज को केवल सूचनाओं ने नहीं बदला। बदलाव तब आया जब सूचना को जिम्मेदारी ने अपनाया।

आखिरकार, जब आपकी मोटरसाइकिल का टायर पंचर होने वाला होता है, तो आप खुद सक्रिय हो जाते हैं। जब कोई आपका पेट्रोल चुरा रहा होता है, तो आप खुद खड़े होते हैं। फिर जब कोई आपको बताता है कि आपके अधिकार, आपका पैसा, आपकी संस्थाएँ और आपका लोकतंत्र नुकसान झेल रहे हैं, तब आप यह उम्मीद क्यों करते हैं कि कोई और आपकी जगह लड़ाई लड़े? शायद इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि पत्रकार अपना काम कर रहे हैं या नहीं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सूचना मिलने के बाद नागरिक अपना काम कर रहा है या नहीं।

You may be interested

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!