डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत की पहचान सदियों से आध्यात्मिकता, धार्मिक सहिष्णुता और नैतिक मूल्यों की भूमि के रूप में रही है। यहाँ धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ, कर्मकांड और मंदिरों में दर्शन करना नहीं, बल्कि सत्य, करुणा, सेवा, त्याग और मानवता को जीवन में उतारना रहा है। संतों, ऋषियों और मनीषियों ने धर्म को मनुष्य के भीतर की चेतना को जागृत करने का माध्यम बनाया। रामायण, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता और पुराणों की कथाएँ पीढ़ियों को जीवन जीने की कला सिखाती रही हैं। लेकिन आज धार्मिक आयोजनों और कथाओं के बढ़ते वैभव के बीच एक गंभीर प्रश्न खड़ा हो रहा है कि क्या धर्म वास्तव में जनकल्याण का माध्यम बना हुआ है या धीरे-धीरे एक बड़े व्यावसायिक आयोजन में परिवर्तित होता जा रहा है?
आज देश के विभिन्न हिस्सों में कथा-वाचन का एक विशाल संसार खड़ा हो गया है। बड़े-बड़े पंडाल, भव्य मंच, आकर्षक सजावट, महंगे ध्वनि उपकरण, विशेष अतिथि, प्रचार वाहन और सामाजिक माध्यमों पर व्यापक प्रचार धार्मिक आयोजनों की पहचान बनते जा रहे हैं। कथावाचकों की लोकप्रियता अब केवल उनके ज्ञान और विचारों से नहीं, बल्कि उनके अनुयायियों की संख्या, आयोजनों की भव्यता और उनकी प्रसिद्धि से भी आँकी जाने लगी है। कुछ कथावाचकों के कार्यक्रमों में उमड़ने वाली भीड़ किसी बड़े मनोरंजन आयोजन का दृश्य प्रस्तुत करती है। धार्मिक प्रवचन के साथ-साथ प्रसिद्धि, प्रचार और आर्थिक सामर्थ्य का प्रदर्शन भी दिखाई देने लगा है।
कथा-वाचन अपने आप में सम्मानजनक और महत्वपूर्ण परंपरा है। कथावाचक समाज को धार्मिक ग्रंथों का मर्म समझाते हैं, नैतिक शिक्षा देते हैं और लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हैं। अनेक संत और विद्वान बिना किसी दिखावे के वर्षों से समाज में आध्यात्मिक चेतना फैलाने का कार्य कर रहे हैं। समस्या कथावाचन की परंपरा में नहीं, बल्कि उसके व्यावसायीकरण में है। जब कथा की गुणवत्ता से अधिक कथावाचक की कीमत महत्वपूर्ण हो जाए, जब आयोजन की सफलता का पैमाना श्रद्धालुओं की संख्या और चढ़ावे की राशि बन जाए तथा जब धर्म के नाम पर आर्थिक सामर्थ्य का प्रदर्शन होने लगे, तब आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है।
आज कई धार्मिक आयोजनों में कथावाचकों के आगमन, मंच व्यवस्था, ठहरने, सुरक्षा और अन्य सुविधाओं पर भारी धनराशि खर्च की जाती है। आयोजकों और श्रद्धालुओं के बीच प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा भी दिखाई देती है। कौन कितना बड़ा आयोजन करवा सकता है, किसके कार्यक्रम में कितनी भीड़ आई और किस कथावाचक के मंच पर कौन-सी प्रतिष्ठित हस्ती पहुँची, ये चर्चाएँ कथा के मूल संदेश पर भारी पड़ने लगती हैं। कहीं-कहीं कथा-वाचन के नाम पर आर्थिक लेन-देन और महँगी व्यवस्थाओं की चर्चा भी सार्वजनिक होती है। हालाँकि सभी कथावाचकों या आयोजनों को एक ही दृष्टि से देखना उचित नहीं है, लेकिन इस बदलती प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाना समाज की जिम्मेदारी है।
सबसे चिंताजनक स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब धार्मिक भावनाओं को आर्थिक लाभ का साधन बनाया जाता है। श्रद्धालु अपनी आस्था के कारण दान देते हैं। कोई अपनी कमाई का हिस्सा समर्पित करता है तो कोई अपनी जीवनभर की बचत से धार्मिक आयोजन में सहयोग करता है। यह उनकी व्यक्तिगत श्रद्धा है और उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन दान की पारदर्शिता, उसके उपयोग और धार्मिक संस्थाओं की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि धर्म के नाम पर एकत्रित धन का उपयोग जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत वैभव और प्रचार में होने लगे तो श्रद्धा का विश्वास कमजोर होता है।
विडंबना देखिए कि मंदिरों में सोने-चाँदी के आभूषणों और बहुमूल्य वस्तुओं का चढ़ावा बढ़ रहा है, वहीं समाज में आज भी अनेक बच्चे भूखे पेट सोने को विवश हैं। कितने ही परिवार आर्थिक अभाव में बच्चों की शिक्षा, उपचार और भोजन की व्यवस्था नहीं कर पाते। अस्पतालों में गरीब मरीज सहायता की प्रतीक्षा करते हैं और विद्यालयों में संसाधनों की कमी बनी रहती है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या धार्मिक आस्था का सबसे बड़ा उद्देश्य केवल भव्य चढ़ावा और विशाल आयोजन होना चाहिए? क्या मंदिरों की समृद्धि के साथ आसपास के निर्धन लोगों का जीवन भी समृद्ध नहीं होना चाहिए?
धर्म का वास्तविक सौंदर्य तभी प्रकट होता है, जब वह पीड़ित के आँसू पोंछे, भूखे को भोजन दे, अशिक्षित को शिक्षा दिलाए और निराश व्यक्ति को आशा प्रदान करे। भगवान राम के आदर्शों में मर्यादा और लोककल्याण है, श्रीकृष्ण के संदेश में कर्म और कर्तव्य का महत्व है तथा बुद्ध की शिक्षाओं में करुणा और अहिंसा का भाव है। इन महान परंपराओं को केवल मंच से सुनाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें व्यवहार में उतारना ही सच्ची धार्मिकता है।
कथावाचकों की लोकप्रियता में सामाजिक माध्यमों की भी बड़ी भूमिका है। कुछ मिनटों के प्रवचन, आकर्षक वेशभूषा, भावुक प्रस्तुतियाँ और प्रभावशाली संवाद तेजी से प्रसारित होते हैं। इससे धार्मिक विचारों का विस्तार हुआ है, लेकिन इसके साथ दिखावे और लोकप्रियता की प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है। कई बार गंभीर धार्मिक विषयों को मनोरंजन की शैली में प्रस्तुत किया जाता है। भावनात्मक वक्तव्यों और चमत्कार संबंधी दावों के माध्यम से श्रद्धालुओं को प्रभावित करने की प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है। ऐसे में श्रोताओं को विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। किसी व्यक्ति की लोकप्रियता उसके ज्ञान, चरित्र और नैतिकता का स्वतः प्रमाण नहीं होती।
समाज को यह भी समझना होगा कि हर कथावाचक व्यापारी नहीं है और हर बड़ा आयोजन अनुचित नहीं है। धार्मिक आयोजनों के संचालन में व्यवस्थाओं पर खर्च स्वाभाविक है। अनेक कथावाचक निःस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं और अपने प्रवचनों से लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं। इसलिए आलोचना व्यक्तियों की नहीं, उन प्रवृत्तियों की होनी चाहिए जो धर्म को धन, प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत लाभ से जोड़ती हैं।
सरकार और सामाजिक संस्थाओं की भी जिम्मेदारी है कि धार्मिक संस्थानों में आर्थिक पारदर्शिता को प्रोत्साहित किया जाए। श्रद्धालुओं को दान के उपयोग की जानकारी मिले। धार्मिक मंचों का उपयोग अंधविश्वास, भेदभाव और सामाजिक वैमनस्य फैलाने के लिए न हो। कथा आयोजनों के साथ रक्तदान, स्वास्थ्य शिविर, निर्धन बच्चों की शिक्षा, गौसेवा और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्यक्रमों को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
आज आवश्यकता कथाओं को बंद करने की नहीं, बल्कि उनके मूल उद्देश्य को पुनर्जीवित करने की है। कथावाचकों को अपनी लोकप्रियता का उपयोग समाज में नैतिकता, सद्भाव और सेवा की भावना बढ़ाने के लिए करना चाहिए। श्रद्धालुओं को भी केवल चमत्कार और भावुकता से प्रभावित होने के बजाय कथाओं के वास्तविक संदेश को समझना चाहिए। धर्म किसी व्यक्ति की संपत्ति नहीं, बल्कि मानवता की साझा विरासत है।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि कथा कितनी बड़ी हुई, पंडाल कितना भव्य बना या चढ़ावा कितना एकत्रित हुआ। असली प्रश्न यह है कि कथा सुनने के बाद कितने लोगों के जीवन में करुणा आई, कितने जरूरतमंदों को सहायता मिली और कितने लोगों ने अपने व्यवहार में नैतिकता अपनाई। जिस दिन धार्मिक आयोजनों की सफलता का मूल्यांकन सेवा, शिक्षा, संवेदना और मानव कल्याण से होने लगेगा, उसी दिन धर्म अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई देगा। आस्था को बाजार बनने से बचाना केवल कथावाचकों का नहीं, बल्कि हर श्रद्धालु और पूरे समाज का दायित्व है।
धर्म कमाई बन गया, बदला सारा दौर।
आस्था की रक्षा करो, जागो भक्तों और॥

