भारत की संस्कृति का मूल चरित्र आध्यात्मिक है। आध्यात्मिक चिन्तन भारतीय संस्कृति की मुख्य विशेषता रही है। भारतीय आध्यात्म मनुष्य के दो पक्षों से प्रभावित रहा है- मस्तिष्क और हृदय अर्थात् बुद्धि और भावना। भारत का आध्यात्मिक दर्शन यहाँ के बौद्धिक वैभव को सामने लाता है तो दूसरी तरफ भारतीय आध्यात्म की भक्तिधारा भारत के ईश्वर चिन्तक सन्तों के भावुक हृदय से जन-जन को अत्यन्त गहरायी से प्रभावित करती है। वास्तव में भारतीय अध्यात्म सदियों से भक्ति के रूप में ही आम लोगों में अपने वैभव, आकर्षण और प्रभाव को प्रसारित करता रहा है। भक्ति भगवान के प्रति अनुमप अनुराग का प्रकटीकरण है और भागवत पुराण इस दृष्टि से भारतीय अध्यात्म की बौद्धिक एवं हृदयगत विशेषताओं को अपने में समाहित करने वाला एक उत्कृष्ट धार्मिक ग्रन्थ है। इस धार्मिक ग्रन्थ में भगवान श्रीकृष्ण की लौकिक एवं अलौकिक विशेषताओं का अत्यन्त हृदयस्पर्शी आख्यान समाहित है।
वस्तुतः भागवत पुराण कलिकाल के सभी पुराणों में सर्वाधिक आदरणीय एवं लोकप्रिय पुराण है। इस पुराण का हिन्दू समाज की धार्मिक, सामाजिक एवं लोक मर्यादाओं की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वैष्णव सम्प्रदाय का यह प्रमुख ग्रन्थ है। भागवत पुराण में वेदों, उपनिषदों तथा दर्शन शास्त्र के गूढ़ विषयों को अत्यन्त सरलता के साथ निरूपित किया गया है। श्रीमद् भागवत कथा में सकाम कर्म, निष्काम कर्म, ज्ञान साधना, सिद्धि साधना, भक्ति, अनुग्रह, मर्यादा, द्वैत-अद्वैत, द्वैताद्वैत, निर्गण-सगुण तथा व्यक्त-अव्यक्त रहस्यों का समन्वय उपलब्ध होता है। भागवत पुराण वर्णन की विशदता और उदात्त काव्य-रमणीयता से ओतप्रोत है। यह विद्या का अक्षय भण्डार है। इसकी कथा कल्याणकारी और दैहिक, दैविक और भौतिक दुःखों के निवारण में समर्थ है। ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य का यह प्रामाणिक धार्मिक ग्रन्थ है।
भागवत पुराण में बारह स्कन्ध हैं जिनमें विष्णु के अवतारों का वर्णन है। नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र अग्रश्रवा सूत जी ने इस पुराण के माध्यम से श्रीकृष्ण के चौबीस अवतारों की कथा कही है।
प्रथम स्कन्ध में कुन्ती और भीष्म के माध्यम से ‘भक्ति योग’ के बारे में बताया गया और ‘परीक्षित की कथा’ के माध्यम से यह बताया गया है कि एक मरते हुए व्यक्ति को क्या करना चाहिए।
द्वितीय स्कन्ध में ‘योग-धारणा’ के द्वारा शरीर त्याग की विधि बतायी गई है। भगवान का ध्यान कैसे करना चाहिये, इस पर भी प्रकाश डाला गया है।
तृतीय स्कन्ध में ‘कपिल-गीता’ का वर्णन है जिसमें ‘भक्ति का मर्म’, ‘काल की महिमा’ और ‘देह-गेह’ में आसक्त पुरूषों की ‘अधोगति’ का वर्णन तथा मनुष्य योनि को प्राप्त हुए जीव की गति का रेखांकन है। इस स्कन्ध में इस बात पर बल है कि केवल भक्ति के सहारे ही मनुष्य इन बन्धनों से छूटकर ईश्वर की ओर अग्रसर हो सकता है।
चतुर्थ स्कन्ध में बताया गया है कि यदि भक्ति सच्ची हो तो उम्र के बंधन का कोई अर्थ नहीं है। ‘ध्रुव की कथा’ ने यही सिद्ध किया है। ‘पुरजनोपाख्यान’ में इन्द्रियों की प्रबलता के बारे में बताया गया है।
पंचम स्कन्ध में ‘भरत-चरित्र’ के माध्यम से यह बताया गया है कि भरत जी कैसे एक हिरण के मोह में पड़कर अपने तीन जन्म गवां देते हैं। ‘भवाटवी’ के प्रसंग में यह बताया गया है कि व्यक्ति अपनी इन्द्रियों के बस में होकर कैसे अपनी दुर्गति करता है। ‘नरकों का वर्णन’ में बताया गया है कि मरने के बाद व्यक्ति को अपने-अपने कर्मों के हिसाब से कैसे नरकों की यातना भोगनी पड़ती है।
षष्ट स्कन्ध में भगवान ‘नाम की महिमा’ के सम्बन्ध में ‘अजामिलोपाख्यान’ है। ‘नारायण कवच’ का वर्णन है जिससे वृत्रासुर का वध होता है। नारायण कवच वास्तव में भगवान के विभिन्न नाम हैं जिसे धारण करने वाले व्यक्ति को कोई परास्त नहीं कर सकता। ‘पुंसवन विधि’ एक संस्कार है जिसके बारे में बताया गया है।
सप्तम स्कन्ध में ‘प्रहलाद-चरित्र’ के माध्यम से बताया गया है कि हजारों मुसीबत आने पर भी भगवान का नाम न छूटे। यदि भगवान का बैरी पिता ही क्यों न हो तो उसे भी छोड़ देना चाहिए। मानव-धर्म, वर्ण-धर्म, स्त्री-धर्म, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रमों के नियम का कैसे पालन करना चाहिए, इसका निरूपण है। कर्म व्यक्ति को कैसे करना चाहिए, यही इस स्कन्ध का सार है।
अष्टम स्कन्ध में भगवान कैसे भक्त के चरण पकड़े हुए व्यक्ति का पहले और बाद में भक्त का उद्धार करते हैं, यह ‘गजेन्द्र-ग्राह कथा’ के माध्यम से बताया गया है। ‘समुद्र मंथन’, ‘मोहिनी अवतार’ और ‘वामन अवतार’ के माध्यम से भगवान की भक्ति और लीलाओं का वर्णन है।
नवम स्कन्ध में ‘सूर्य-वंश’ और ‘चन्द्र-वंश’ की कथाओं के माध्यम से उन राजाओं का वर्णन है जिनकी भक्ति के कारण भगवान ने उनके वंश में जन्म लिया। इस चरित्र को सुनने मात्र से जीव पवित्र हो जाता है। यही इस स्कन्ध का सार है।
भागवत का हृदय दशम स्कन्ध है। दशम स्कन्ध के पूर्वार्द्ध में भगवान के लिए उनके भक्तों के महत्व का वर्णन है। इसमें विस्तार से घटनाओं के माध्यम से यह बताया गया है कि भगवान की सारी लीलाएं केवल भक्तों के कल्याण के लिए होती है और इन लीलाओं का श्रवण, चिन्तन और मनन बस यही जीवन का सार है। दशम स्कन्ध के उत्तरार्द्ध में भगवान की ‘ऐश्वर्य लीला’ का वर्णन है, जहाँ भगवान ने बांसुरी छोड़कर सुदर्शन चक्र धारणा किया। इस स्कन्ध में उनकी कर्मभूमि, नित्यचर्या और गृहस्थ का बड़ा ही अनुपम वर्णन है।
एकादश स्कन्ध में भगवान ने अपने ही यदुवंश को ऋषियों का शाप लगाकर यह बताया कि गलती चाहे कोई भी करे, उसको अपनी करनी का फल भोगना पड़ेगा। भगवान की माया बड़ी प्रबल है और उससे पार होने के उपाय केवल भगवान की भक्ति है। यही इस स्कन्ध का सार है। इस स्कन्ध के ‘अवधूतोपख्यान’ में 24 गुरूओं की कथा एवं शिक्षा हैं।
द्वादश स्कन्ध में भगवान के ‘नामसंकीर्तन’ की महिमा का वर्णन है। इसे ही कलयुग के दोषों से बचने का उपाय बताया गया है।
उल्लेखनीय है कि भागवत पुराण में बार-बार श्रीकृष्ण के ईश्वरीय और अलौकिक रूप का ही वर्णन किया गया है। पुराणों के लक्षणों में प्रायः पाँच विषयों का उल्लेख किया गया है किन्तु इसमें दस विषयों सर्ग-विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय का वर्णन प्राप्त होता है। इस पुराण में श्रीकृष्ण के गुणों का बखान करते हुए कहा गया है कि उनके भक्तों की शरण लेने से किरात, हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन और खस आदि तत्कालीन जातियाँ भी पवित्र हो जाती हैं। अतएव, सारांश में कहा जा सकता है कि भागवत पुराण भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य की त्रिवेणी है जहाँ भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन अपने उत्कर्ष के साथ चमक रहा है।
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