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संकलन-अंजु अग्निहोत्री

जयति रघुवंशमणि -भानुकुलभूषणं,
दहनदलदैत्य-दशकन्ध-खरदूषणं।
रूप नख-शिख रुचिर विमल तन इन्दिवर,
अतुल-छवि -सिन्धु कन्दर्प-महि-गंजनं।।
लसत पट पीत तन तड़ित जिमि मध्य धन,
लसत कुंडल श्रवण कान्ति शशि-भंजनं।
जलद जलजात तन दिपत उरमाला मणि,
नील नभ मध्य जिमि सोहें शुभ उडुगनं।।
कम्बु-सम ग्रीव छवि सींव राजीव दद्ग,
सरस चितवन-हँसन मदन-मद-मर्दनं।
अरुण बिम्बोष्ठ, शुचि दन्त द्युति कौमुदी,
चिबुक अति शुभग छवि श्रवण मनहारनं।।
वृषभवर-कंध, युग पीन उर, कंज कर,
सिंह कटि, उदर त्रैरेख सुख-वर्द्धनं।
पद्य पद विमल नख-दीप्ति मणि-कान्तिवत्,

निरख छवि लजत शतकोटि मन्मथगणं।।
व्याप्त सर्वत्र, सर्वज्ञ, सर्वेश, अज,

भक्त सुख दैन, मुनि-सन्त-हिय-चन्दनं।
अगम भव-जलधि ते करहु अब पार प्रभु,

बसहु जन-हृदय बिच नित्य रघुनन्दनं।।

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