-अंजु अग्निहोत्री
सनातन धर्म की 51 शक्तिपीठों में से एक शक्ति पीठ मां कांगड़ा देवी का मंदिर है। मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में अपनी गौरवमयी महिमा से सभी को सनातन की शक्ति का अहसास करा रहा है। मंदिर को नगरकोट देवी या कांगड़ा देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की नींव पांडव काल में रखी गई थी। इस स्थान पर माता का बाया वक्ष गिरा था। जिसके पीछे यह कथा है कि माता सती के पिता ने एक विशाल हवन का आयोजन किया था। इसमें दूर देश के राजाओं तथा कई बड़े ऋषियों को आमंत्रित किया गया था लेकिन माता सती के पति भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया था। माता सती अपने पति का यह अपमान सहन नहीं कर पाई और उन्होंने उसी हवन कुंड में छलांग लगा दी और अपने प्राण त्याग दिए तब भगवान शिव सती के मृत शरीर के लेकर ब्रह्मांड में घूमे। इसी दौरान भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर दिए। जो टुकड़ा इस स्थान पर आकर गिरा था वही ब्रजेश्वरी देवी मंदिर कहलाया।मुख्य द्वार के प्रवेश द्वार में एक नागरखाना या ड्रम हाउस है और इसे बेसिन किले के प्रवेश द्वार के समान बनाया गया है। मंदिर भी किले की तरह एक पत्थर की दीवार से घिरा हुआ है।
माता कांगड़ा देवी के मंदिर में हर वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर मेला का आयोजन होता है। मकर संक्रांति के दिन माता के पिंड के ऊपर कई क्विंटल मक्खन चढ़ाया जाता है। इसके पीछे की मान्यता यह है कि माता ने जब महिषासुर राक्षस का वध किया था तो युद्ध के दौरान माता को भी कुछ घाव लगे थे जिन्हें ठीक करने के लिए देवी-देवताओं ने माता को मक्खन रूपी घृत का लेप लगाया था। इसके बाद से यह परंपरा चली आ रही है। महिषासुर का वध करने के बाद माता को महिषासुर मर्दिनी के नाम से भी जाना जाता है। इसी कारण से इस मंदिर के पिंड के पीछे अष्टादश भुजा मूर्ति स्थापित की गई है। इस तरह की मूर्ति अन्य किसी शक्तिपीठों में नहीं है। मंदिर में चढ़ाए गए मक्खन को एक सप्ताह बाद भक्तों को प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता है। कहते हैं कि इस प्रसाद को अगर किसी चर्म रोग के स्थान पर लगाया जाए तो वह रोग ठीक हो जाता है। यह भी कहा जाता है कि दैत्यराज जालंधर भी इसी जगह दफन है।
महाराजा रणजीत सिंह ब्रजेश्वरी माता के बड़े भक्त थे। उनके द्वारा चढ़ाई गई सोने की मूर्ति मंदिर में आज भी विद्यमान है। मंदिर की संपदा को देखकर महमूद जनवी ने पांच बार इस मंदिर को लूटा। अंग्रेज वायसराय लार्ड इरविन भी इस मंदिर में आकर पूजा की थी तथा वस्त्र चढ़ाया था जो मंदिर में आज भी मौजूद है। अफगानिस्तान के एक राजा ने संवत 5 में एक पांडुलिपि शिलालेख इस मंदिर में दिया था जो अभी भी यहां मौजूद है। उत्तर प्रदेश के एक भक्त ध्यानु भगत ने इस मंदिर में अपना शीश काटकर चढ़ाया था। कहते हैं कि उस भक्त का शीश फिर से जुड़ गया था। तब से उस क्षेत्र के लोग माता ब्रजेश्वरी देवी को अपना कुलदेवी मानते हैं तथा पीले वस्त्र पहनकर माता की पूजा के लिए आते हैं। लगभग पचास वर्ष पूर्व एक भक्त ने यहां अपनी जिव्हा काटकर चढ़ा दिया था। इसके एक सप्ताह के बाद उस भक्त का जीवा फिर जुड़ गया था। इसके बाद से मंदिर के पुजारियों के द्वारा ऐसा करने से सख्त मना कर दिया था। सिख धर्म के भाटरा समुदाय के लोग भी इस माता को अपना कुलदेवी मानते हैं तथा अपने बच्चे का मुंडन कराने यहां आते हैं।
सन् 1905 के भूकंप में यह मंदिर टूट गया था जिसके बाद इस मंदिर का निर्माण फिर से किया गया है। नगर कोट का यह धाम पवित्र माना जाता है तथा यहां साल भर भक्तों की भीड़ लगी होती है।

