विदर्भ कुमार
01 – गीतगंध –
गीत संग्रह वर्ष-2010, अंजलि प्रकाशन, लखनऊ। अशोक कुमार पाण्डेय, प्रलयंकर, विनोद चंद्र पाण्डेय ‘विनोद’ रामाश्रय सविता, शिवभजन कमलेश की शुभाशंसा, समीक्षा है। कुल इक्यावन गीतों का संकलन है। पूर्व निदेशक, उ०प्र० हिन्दी संस्थान लखनऊ, सुकवि विनोद चन्द्र पाण्डेय ‘विनोद’, मंगल-कामना में लिखते हैं कि- “पथिक जी उदार – भावनाओं और उच्च विचारों के कवि हैं। वर्तमान राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याओं पर उन्होंने अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए राष्ट्र निर्माण की दिशा में अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से समयोचित समाधान सुझाया है। परहित और परोपकार के महत्व को भी उन्होंने रेखांकित किया है।”
02 – छन्द मंजरी –
छन्द संग्रह, वर्ष-2011, अंजलि, प्रकाशन लखनऊ, रामेश्वर प्रसाद द्विवेदी ‘प्रलयंकर’ डा. सत्य सागर शर्मा, अशोक कुमार पाण्डेय ‘अशोक’, शंभूनाथ सिंह, राजेन्द्र शुक्ल ‘राज’ की शुभ कामनाएं, समीक्षाएं संग्रहीत है। 75 सवैया, 54 घनाक्षरी, 54 सवैया विविध विषयों पर निबद्ध हैं। अंत में बाबू लालशर्मा बाल कवि की शुभकामना युक्त दो घनाक्षरी है। सम्पादक ब्रजकुमुदेश श्री अशोक कुमार पाण्डेय ‘अशोकजी’ ‘पुरोवाक’ में लिखते है कि – “छंद मंजरी अनेक छन्दों, रसों एवं भाव सुमनों से युक्त है, इसमें बहुआयामी विचार प्रस्तुत किये गये हैं। डा. पथिक ने जो भी भाव अपनी इस कृति में संजोया है। वह समाजोपयोगी, कालजयी एवं शाश्वत हैं ।”
03 – पंचग-
निबंध संग्रह, वर्ष 2014, अंजलि प्रकाशन लखनऊ। डॉ. प्रेमशंकर तिवारी, ल.वि.वि, राजेन्द्रशुक्ल राज, डा. सत्य सागर शर्मा, डा. रामाश्रय सविता की समीक्षाएं हैं। कुल 21 निबंध संग्रहीत हैं। जिसमें, साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं ललित प्रधान लेख हैं। कुल पृष्ठ संख्या-128
साहित्य भूषण डॉ. रामाश्रय सविता जी लिखते हैं कि- “इस प्रकार इस निबंध संग्रह में संग्रहीत निबंधों में ऐसा बहुत कुछ है, जो मानव जीवन को प्रभावित, शासित और अनुशासित कर सकता है। वास्तव में यह पठनीय एवं संग्रहणीय लेख संग्रह है, जिसकी उपयोगिता असंदिग्ध है। डा० पथिक को इनके प्रणयन के लिए बधाई और साधुवाद।”
04 छंद छटा-
छन्द-संग्रह, वर्ष-2015, अंजलि प्रकाशन लखनऊ। प्रो० हरिशंकर मिश्र ल. वि. वि., डॉ. रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’, आचार्य राम देव लाल ‘विभोर’ साहित्य भूषण, अनन्त प्रकाश तिवारी, अजय कुमार द्विवेदी ‘प्रसून’ की समीक्षाएं पुस्तक को प्राप्त है। इसमें विविध विषयान्तर्गत 142 सवैया है छंद और 82 घनाक्षरियाँ संग्रहीत है। बाबू लाल शर्मा ‘प्रेम’ संग्रह संबंधी दो कुण्डलियाँ है। कुल पृष्ठ संख्या-144 है।
” समग्रता की दृष्टि में ‘छंद-छटा’ एक रोचक काव्य कृति है । विषयगत विविधता के साथ ही छंदगत लालित्य इस कृति की विशिष्ट विशेषता है। कृति में सवैया की प्रबहमान सरिता व घनाक्षरी की उमड़ती -घुमड़ती झील दोनों विद्यमान हैं। कृति के सभी छंद पूर्वापर निरपेक्ष होकर भी रसास्वादन कराने में समर्थ है। — एक ईश्वरीय अनुभूति विद्यमान है, जिसको प्राप्त करके आत्मा आनन्दित हो जाती है।”- काव्याचार्य, साहित्यभूषण आचार्य रामदेवलाल “विभोर”।
05 – अर्थापकर्ष-
काव्य संग्रह, वर्ष-2016, नमन प्रकाशन लखनऊ, पृष्ठ संख्या-71, डॉ. अजय प्रसून जी दोहा छंद में लिखते है कि-
सत्यदेव वह नाम है लेखन जिसकी शक्ति।
लिए लेखनी हाथ में मन में नवधा भक्ति।।
साहित्यिक आकाश में पथिक बने श्रीमान।
छूं लेंगे वह व्योम को, यदि चाहे भगवान्॥
छंद छटा पंचग सहित कृति है अर्थापकर्ष।
धूप छाँह के साथ ही जीवन जिये सहर्ष ।।
आचार्य रामदेव लाल विभोर ने लिखा है कि- “पागल, स्वरग धाम् , सुपरीक्षा, भक्ति, गधा, नंगा, सहानुभूति, शकुन, पहचान और होनहार शब्दों पर रची गयी पंक्तियों में उनका अपकर्ष होने का तार्किक विवेचन कृतिकार की प्रतिभा को छविमान करता है।”
06- एकदा नैमिषारण्ये-
यात्रा-वृतान्त, वर्ष-2016, नमन, प्रकाशन लखनऊ, पृष्ठ संख्या-144, इसमें कुल सत्तरह यात्राओं का सजीव वर्णन है।
प्रो० हरिशंकर मिश्र जी लिखते हैं कि -“इन यात्रावृत्तों में लेखक ने धैर्य पूर्वक संबद्ध स्थल क्षेत्र की छोटी से छोटी एवं बड़ी से बड़ी विशेषताओं को सहज एवं सरस शैली में रूपायित किया है। पढ़ने के साथ-साथ स्थलों के बिम्ब प्रत्यक्ष उभर आते हैं और मन आहलाद से आपूरित हो जाता है ।”
07- अभी उड़ान शेष-
गीत संग्रह, वर्ष-2017, नमन प्रकाशन लखनऊ, कुल पृष्ठ संख्या – 109, इसमें मातृ वंदना, बसंत एवं शृंगार, राष्ट्रीय गीत, पर्व-त्योहार, वर्षा ऋतु, आध्यात्मिक, सामाजिक शीर्षकों में इक्यावन गीत संग्रहीत हैं।
प्रो० हरिशंकर मिश्र, डा. गोपाल कृष्ण शर्मा ‘मृदुल’, शिव भजन ‘कमलेश’, आचार्य रामदेव लाल ‘विभोर’, डा. कृष्णा जी श्रीवास्तव ल.वि.वि. की अभिशंसा, अभिमत संग्रहीत है। वरिष्ठ गीतकार शिवभजन ‘कमलेश’ जी लिखते हैं कि- ” कजरारे नयन” शीर्षक से जो गीत बसंत के परिप्रेक्ष्य में सम्मिलित हुआ है, मेरी दृष्टि में श्रृंगार की सर्वश्रेष्ठ रचना है। पाँच चरण का यह गीत कई दृष्टियों में अनूठा है। प्रथम चरण में सांग रूपक के साथ शनिदेव का रूपान्तरण है, और अंतिम चरण में चौथ के चन्द्रमा की वर्जना । तथापि नायिका के नेत्रों ने कालेपन को अपने में आत्मसात कर चारूता में और अभिवृद्धि की है।“
“सब भाव बुरे कालेपन के, अखियों ने उसे सँवारे हैं।“
8- ‘उठो- चलो’ – ‘गीत संग्रह’, वर्ष 2018, नमन प्रकाशन लखनऊ, कुल पृष्ठ संख्या-112, इसमें वंदना, राष्ट्र प्रेम, प्राकृतिक प्रेम, आध्यात्मिक और सामाजिक विषयों के बहत्तर गीत संकलित है। प्रो० सूर्य प्रसाद दीक्षित, आचार्य रामदेव लाल विभोर, साहित्यभूषण दयानंद जड़िया ‘अबोध’, गीतकार सर्वजीत मिश्र जी की समीक्षाएं संग्रहीत हैं। आचार्य रामदेव लाल ‘विभोर’ जी लिखते हैं कि-
“गीत कृति ‘उठो चलो’ के प्रकृति गीत अपनी मनोहारी छवि बिखेरते है । उनमें नैसर्गिक अवयवों की आभा देखते बनती है। गीतकार की दृष्टि जब मोहक मुरैला पर पड़ती है तब वह सामान्य से अति ऊपर उठ कर विशिष्ट गुण ध्वनित करती है यहाँ गीत की भाषा व भाव दोनों श्लाघ्यनीय है। पंक्तियाँ देखें-
तिक्त तन्तुखा मधु मयूर तुम, बनते शिव के साथी।
माता के चरणों में रहकर, यह विद्या तब आती।।
सकल सृष्टि का ले विषाद कवि, रखता अभ्यंतर है।
क्रांति बीज के बोता जन तब, बनता प्रलयंकर है ।।
9- बैरिउ राम बड़ाई करहीं-
यात्रा साहित्य, वर्ष 2019, अंजली प्रकाशन लखनऊ, कुल पृष्ठ संख्या-168, इसमें कुल तेईस यात्राओं का वर्णन है, जिसमें मलेशिया और सिंगापुर दो विदेशी यात्राएं हैं। प्रो० हरिशंकर मिश्र, काव्याचार्य रामदेव लाल ‘विभोर’ जी की विस्तृत समीक्षा भी है। 24 रंगीन यात्रा संबंधी चित्र भी हैं।
विभोर जी अपनी भूमिका में लिखते हैं कि – 19वीं यात्रा का द्रावक चित्रण- पथिक जी आस्था और संस्कृति बोध के कवि भी हैं। बीबीपुर में दुर्गा शक्ति पीठ मंदिर में यश लोभ के प्रदर्शन को देखकर वे असहज हो जाते हैं। अवछित मानते हैं- “यशलाभ जब लोभ के धरातल पर उतर जाता है। तब अध: पतन का जो स्वरूप दिखता है, वह विचित्र होता है। इससे आस्था, विश्वास और श्रद्धा जैसे उदात्त तत्व भी धुंध होने लगते हैं। परमार्थ की जगह स्वार्थ की झलक दिखाई देने लगती है— त्याग-तपस्या और परमार्थ की सिद्धि को प्राप्त करना जितना कठिन है। उससे भी अधिक मुश्किल है, उसके स्वरूप को बचाये रखना।”
10- सरयू-शतक-
खण्डकाव्य, वर्ष-2020, प्रतिष्ठा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था लखनऊ, कुल पृष्ठ संख्या-96, वंदना, अवतरण, तटशोभा, वैभव वर्णन एवं माहात्म्य पाँच सर्गों सरयू की पावन कथा वर्णित है। यह उ0 प्र0 हिन्दी संस्थान लखनऊ से नामित पुरस्कार से पुरस्कृत भी है। आचार्य रामदेव लाल विभोर जी लिखते हैं कि- “आज के परिवेश में सरयू- शतक जैसी भक्ति कृति की ज्वलन्त आवश्यकता है। समाज इतना दूषित और विडम्बना ग्रस्त है कि भक्ति शक्ति की आवश्यकता आ पड़ी है। जनमानस में ईश्वर विषयक प्रेम का नवजागरण अब होना ही है। डा. सत्यदेव प्रसाद द्विवेदी ‘पथिक’ की यह पावन एवं उपयोगी कृति समाज की दशा व दिशा बदलने की क्षमता रखती, और यदि मानव मन इस दिशा में लेशमात्र भी भक्ति भावना पकड़ सकेगा तो यह कृति और कृतिकार दोनों ही धन्य हो जायेंगे ऐसा अपना विश्वास है।”
11- मौन का संवाद-
गीत संग्रह, वर्ष-2021, नमन प्रकाशन लखनऊ, पृष्ठ संख्या-103, इसमें – वंदना, प्रकृति प्रेम, राष्ट्र- प्रेम, आध्यात्मिक, सौन्दर्यचित्रण, सामाजिक विषयों के अन्तर्गत कुल सतहत्तर गीत निबद्ध हैं। आचार्य प्रवर प्रो० सूर्य प्रसाद दीक्षित, डा. कृष्णा जी श्रीवास्तव ल. वि.वि., मंगलाशा, शुभाशंसा पुस्तक को प्राप्त है। ‘मंगलाशा’ में आचार्य प्रवर सूर्यप्रसाद दीक्षित जी लिखते है कि – “दिनकर जी की एक प्रसिद्ध उक्ति है-“मूक है सबसे बड़ी आवाज।” अज्ञेय जी ने भी ठीक ही कहा है कि, युग चिंतक रचनाकार विषम परिस्थितियों में “मौन की दहाड़ सुनता है।’ इधर हिन्दी कविता कुछ ज्यादा ही आत्मकेन्द्रित और वाचाल हो गयी है। केवल आत्म संत्रास एवं नपुंसक आक्रोश में खोई हुई है। न देश काल के तथ्य परक यथार्थ से जुड़ी हुई है और न भविष्यत से। ‘पधिक’ जी के ये गीत मुख्यतः परस्मैपदी है, आत्मने पदी तो कदापि नहीं।”
12-भारतीयम-
महाकाव्य, वर्ष 2021, नमन, प्रकाशन लखनऊ, पृष्ठ संख्या-208 इसमें वंदना, अस्मिता, अस्तित्व, बोध, वैभव वर्णन, माहात्म्य चित्रण, व्रत-त्योहार, नैसगिकी, वैशिष्ट्य, उपसंहार सर्गों में भारत वर्ष की गरिमा गौरव का विस्तृत चित्रण किया गया है। अंत में सवैया तथा घनाक्षरीका व्याकरण भी दिया गया है। प्रो० हरिशंकर मिश्र, साहित्य भूषण आचार्य रामदेव लाल ‘विभोर’, साहित्य भूषण डा. मृदुल शर्मा की वृहद समीक्षा भी सम्मिलित है। डा० मुद्दल शर्मा जी लिखते हैं कि–“गणात्मकता का निर्वाह बहुत ही दुष्कर कार्य है। खड़ी बोली हिन्दी में तो और भी कठिन है। किन्तु डा. पथिक ने अपने सभी सवैया छन्दों में गणात्मकता का पूर्ण निर्वाह किया है तथा इस कृति में इन्होंने कुछ नये सवैया छंदों से भी हिन्दी जगत को परिचित कराया है। सरयू सवैया प्रथम, सरयू सवैया द्वितीय एवं पथिक ‘संवैया नवीन है। “आचार्य रामदेव लाल विभोर जी ने लिखा है कि- ।।आचार्य पिंगल जी का प्रसिद्ध सूत्र है- “मसं मासं कुर्यात् छंद भंगं न कारयेत्।” अर्थात गणात्मक छंदों में मात्राओं को लघु दीर्घ छंद की गणपूर्ति हेतु कर सकते हैं। किन्तु गण दोष कदापि नहीं करना चाहिए। गण विधान ही लय विधान है क्योंकि गण को लय खण्ड कहा गया है, इस दृष्टि से भाषा को आवश्यकतानुसार लोचदार किया जा सकता है।”
13- मख क्षेत्रे मनोरमा –
महाकाव्य, वर्ष 2022, नमन प्रकाशन लखनऊ, पृष्ठ संख्या 112, इसमें वंदना, अवतरण, तट शोभा, नैसर्गिकी, पर्यावरण, अधिष्ठात्री, वैभव वर्णन, माहात्म्य चित्रण, उपसंहार शीर्षको में सप्तम धार मनोरमा का माहात्म्य वर्णित है आचार्य प्रवर प्रो० सूर्य प्रसाद दीक्षित की शुभाशंसा तथा डा. योगेन्द्र प्रताप सिंह प्रो. एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, ल. वि. वि. की भूमिका भी सुशोभित है। नचिकेता पुराण में तिर्रेमनोरमा के माहात्म्य का विस्तृत वर्णन मिलता है।
अन्य क्षेत्रे कृतं पापं काशी क्षेत्रे विनश्यति।
काशी क्षेत्रे कृतं पापं प्रयाग क्षेत्र विनश्यति॥
प्रयाग क्षेत्र कृतं पापं मनोरमां विनश्यति।
मनोरमां कृते पापं वज्र लेपो भविष्यति।”
प्रो० योगेन्द्र प्रताप सिंह जी अपनी भूमिका में लिखते है कि-
” कहना न होगा कि जिन सुलझे कवियों ने अप्रस्तुत विधान के माध्यम से जागतिक चिंतन पर लेखानी- चलाई है, कवि पथिक उनमें से एक हैं। मनोरमा नदी के माध्यम से नदियों को स्वच्छ रखने और तटीय जीवन संस्कारों को संरक्षित रखने की अभीप्सा में यह कृति पठनीय है।”
14-च्यवन-चरित-
महाकाव्य, वर्ष-2023, शतरंग प्रकाशन लखनऊ। पृष्ठ संख्या 266, इसमें मंगलाचरण, तमस निवारिणी तमसा, ऋतु वर्णन, सनातन ऋषि परंपरा, ऋषियों का प्रदेय, च्यवन ऋषि का जन्म, ब्रह्माचरण और तपस्वी जीवन, च्यवन सुकन्या च्यवन शर्याति, च्यवन का प्रदेय, अध्यात्म, सत्य सनातन, उपसंहार शीर्षकों में सम्पूर्ण महाकाव्य व्यवस्थित है। अंत मे सवैया और घनाक्षरी का व्याकरण दिया गया है। यह महाकाव्य पूर्णत: शोधपूर्ण एवं लोकमंगल की भाव भूमि पर आधारित है। प्रो० हरिशंकर मिश्र, प्रो. डा. उमाशंकर शुक्ल शितिकण्ठ की विस्तृत समीक्षा के साथ च्यवन विषयक यात्रा वृत्तान्त का भी चित्रण है। संदर्भ सूची भी साथ में संलग्न है। ऋषि भृगु की उत्पत्ति, भृगु पुलोमा के पुत्र च्यवन की जन्म कथा बड़े ही रोचक एवं कौतूहल पूर्ण शैली में वर्णित है। आठवें मास में ही माता पुलोमा की रक्षा के लिए गर्भ से च्युत होने के कारण भृगु पुत्र का नाम च्यवन पड़ा। प्रो० हरिशंकर मिश्र जी भूमिका में लिखते हैं कि “वैदिक, पौराणिक तथा लौकिक आख्यानों-उपाख्यानों का डा० द्विवेदी अत्यन्त गंभीरता से अनुशीलन-परिशीलन करते है। और लोकहित में उसकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति करते हैं। आप शोध वृत्ति के धनी हैं। अनुसंधान पूर्वक तथ्यों का अनुशीलन एवं समीक्षा करने के पश्चात ही आपकी लेखनी प्रवृत्त होती है। अतः आपकी रचनाओं में, विश्वसनीयता विद्यमान रहती है।”
‘शितिकण्ठ’ जी लिखते हैं कि- “इसकी कथावस्तु कौतूहल पूर्ण, मनोविज्ञान सम्मत तथा महत् संदेश प्रद है। भाव और कला पक्ष दोनों ही। दृष्टियों से सम्पूर्ण कृति मनोहारी है। वस्तू वर्णन, दृश्य अंकन, प्रकृति तथा मानवीय रूप सौन्दर्य एवं भाव निरूपण में कवि को पूरी सफलता मिली है। उदाहरणार्थ यहाँ तमसा नदी के गरिमा मय परिवेश का एक छेद दृष्टव्य है।
कहुँ कूकति कोयल कूकभरी, कहुँ मोरनि ठाठ दिखा रही तमसा।
प्रिय पाँति पशून चरैं विहरैं, कहुँ पक्षिन हाट लगा रही तमसा।।
मिल संत सभी सतसंग करैं, कहूँ मुक्तिन बाट सजा रही तमसा।
सब मोद प्रमोद करैं तट पे, बहु भाँति सुधार लुभा रही तमसा”
15- फुलवा खिलाई रितु पाई –
अवधी गीत संग्रह, वर्ष 2023, शतरंग प्रकाशन लखनऊ, पृष्ठ संख्या-88, इसमें वंदना, ऋतु वर्णन, सामाजिक, देश प्रेम और अध्यात्म शीर्षकों में कुल 51 गीत संकलित है। श्री सच्चिदानंद तिवारी ‘शलभ’ और श्री सम्पत्ति कुमार मिश्र’ भ्रमर वैसवारी’ की विस्तृत समीक्षा अंकित है।
“भ्रमर वैसवारी जी लिखते हैं कि- “डा० सत्यदेव प्रसाद द्विवेदी ‘पथिक’ किसी परिचय के मोहताज नहीं है। अब तक इनकी अठ्ठारह किताबें प्रकाशित हो चुकी है। डा. पथिक शास्त्र के मर्मज्ञ भी हैं। इन्हों ने सरयू सवैया प्रथम, सरयू सवैया द्वितीय और पथिक सवैया का प्रवर्तन भी किया है। तीन नये सवैया छन्दों का सृजन के साथ गणाधार सवैया छंदों के सृजन में विशेष ख्याति प्राप्त की है।
16- ‘त्याग में तृप्ति का भाव ही प्यार है‘ मुक्तक संग्रह‘–
वर्ष-2023, शतरंग प्रकाशन, लखनऊ। पृष्ठ संख्या-86, इसमें गुरु वंदना, सामाजिक, देश-प्रेम, अध्यात्म और नीति परक शीर्षकों में कुल 142 मुक्तक संग्रहीत हैं। लखनऊ वि०वि० के विधि संकाय के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं अधिष्ठाता प्रो० डा० वी० जी०, गोस्वामी विधिभूषण जी ने ‘शुभाशंसा’ में लिखा है कि- ‘उत्कृष्ट श्रेष्ठ काव्य के दर्शन से मन सम्पूर्ण पढ़ने का लालच किसी प्रकार छोड़ नहीं पाया। मुझे लगता है, यह पाँचो सर्ग भावों के सुगन्धित पुष्पों से बड़े प्रेम से संवारे गये हैं। आत्म विभोर करने वाली इस कृति के आस्वाद में मन ऐसा डूबा कि निरन्तर पढ़ने में निमग्न रहा। मन में एक कश मकश सी लगी कि कौन से भावों को लिखे और किन भावों को छोड़ दें।” फिर लिखते हैं कि – “एक मुक्तक में बड़ी अनोखी किन्तु सत्य बात को लिखा गया है। खुशी बाँटने से बढ़ती है और इसी बिन्दु पर आपके हृदय की मनोहारी बात स्पष्ट होती है, कहते हैं कि त्याग में तृप्ति का भाव ही प्यार है। प्रेम में प्रेमी त्याग करता है समर्पित होता है तो उसे सुकून मिलता है। तृप्ति का भाव आता है, इसलिए केवल त्याग करने में जो तृप्ति मिलती है वही प्यार है, सचमुच वही प्यार है।”
17- “लक्ष्मण रेखा याद रहे”-
हिन्दी गजल संग्रह- वर्ष 2023, शतरंग प्रकाशन लखनऊ, पृष्ठ संख्या- 84, इसमें विभिन्न विषयों पर कुल 66 हिन्दी गजल संग्रहीत है। तड़िता काव्य विधा के प्रवर्तक श्री सच्चिदानंद तिवारी ‘शलभ’ जी लिखते है कि- “इस कृति की सराहना यदि मैं स्मृतिशेष कुँवर बेचैन के शब्दों करूँ तो कह सकता हूँ कि इसकी गजलें रेगिस्तान के प्यासे होंठों पर उतरती हुई शीतल तरंग की उमंग है। घने अंधकार में टहलती हुई चिंगारी है। यह नींद से पहले का सपना है। जागरण के बाद का उल्लास है। गुलाबी पांखुरी के मंच पर बैठी हुई खुशबू का मौन स्पर्श है।”
18-“चुप्पी टूट गयी“-
हिन्दी गजल संग्रह- वर्ष-2025, शतरंग प्रकाशन लखनऊ कुल पृष्ठ संख्या-76, इसमें वंदना, सामाजिक, देश प्रेम, आध्यात्मिक शीर्षकों के अन्तर्गत कुल 64 हिन्दी गजले व्यवस्थित है। प्रसिद्ध शायर श्री कृपाशंकर ‘विश्वास’ जी लिखते हैं कि. ‘अतीव प्रसन्नता का विषय यह रहा कि लेखन क्षेत्र में विभिन्न कीर्तिमान स्थापित करते-करते हिन्दी में गजल कहने की इच्छा एक उद्दाम लालसा में परिवर्तित हुई, पता ही नही चला- इन दो अलग-अलग पाण्डुलिपियों में 66 एवं 64 रचनाएं सम्मिलित की जा रही हैं जिनका नाम ‘लक्ष्मण रेखा याद रहे’ एवं चुप्पी टूट गयी’ दिया गया है। आम बोलचाल की भाषा के साथ अवधी, व्रज, खड़ी बोली के शब्द इतनी चस्बुकदस्ती के साथ इस्तेमाल किये गये हैं, लगता है जैसे किसी आभूषण के नगीने।”
19- “सरयू से सियेन तक”-
यात्रा वृत्तान्त, वर्ष- 2024, शतरंग प्रकाशन लखनऊ, कुल पृष्ठ संख्या- 129, इसमें फ्रान्स, जेनेवा, स्विट्जर लैण्ड, इटली, जार्डन, बेटिकन सिटी देशों के साथ कुल बीस यात्राओं का चित्रण है। यह एक पर्यटन कथा है। जिसमें ज्ञानवर्धन के साथ उल्लास, उमंग और सौन्दर्य दृश्यों का भी चित्रण किया गया है। मंगलाशा में आचार्य प्रवर प्रो० सूर्य प्रसाद दीक्षित जी लिखते है कि – “यात्रा साहित्य अभी हिन्दी में सांगोपांग विकसित नहीं है। घुम्मकड शास्त्री पं. राहुल सांकृत्यायन, अज्ञेय, यशपाल, जैन, प्रभाकर जी आदि लेखकों ने भरसक इस विधा का पोषण किया हैं, किन्तु हजारों वर्षों की पुरानी भारतीय सी क सम्पदा अभी पूरी तरह उद्घाटित नहीं हो। पायी है। इस दृष्टि से पथिक जी का यह प्रयास स्वागत योग्य है। उनकी इस कृति की एक उल्लेखनीय विशेषता यह भी है कि उन्होंने स्वदेश के कई ऐसे स्थलों को खोज निकाला है जो अभी बहुत सुगम, सर्व सुविधा वित्त सम्पन्न तथा सुविख्यात नहीं है। अस्तु मै पथिकजी को बधाई देता हूँ और इसकृति का स्वागत करता है।”
20- ‘श्रवन-चरित’- महाकाव्य, वर्ष-2025 शतरंग प्रकाशन लखनऊ कुल पृष्ठ संख्या-360, इसमें श्रवनडीह की पौराणिकता, श्रवण पाकड़ का महत्व श्रवण तोंदी सिद्ध पीठ, श्रवण धाम छोटी त्रिवेणी अन्हवाय शीर्षकों के अन्तर्गत चार शोध आलेख एवं शोध स्थलों के रंगीन चित्र सम्मिलित हैं। पन्द्रह सर्गों में श्रवण कुमार के जीवन वृत्त को उकेरा गया है। शोध की संदर्भ सूची संलग्न है। अंत में सभी छन्दों सवैया तथा घनाक्षरी का व्याकरण भी प्रस्तुत किया गया है। गणाधार सवैया छंदों में कृति का सृजन किया गया है। 333 गंगोदक के साथ कुल 816 छंदों में सम्पूर्ण श्रवण चरित महाकाव्य की रचना की गई है। हिन्दी साहित्य के तीन शीर्ष समीक्षकों आचार्य प्रवर, प्रो0 सूर्य प्रसाद दीक्षित जी. प्रो० हरिशंकर मिश्र जी क्या साहित्य भूषण प्रो० उमाशंकर शुक्ल ‘शितिकण्ठ’ जी के आशीष स्वरूप समीक्षाएं प्राप्त हैं। प्रो० सूर्यप्रसाद दीक्षित जी लिखते हैं कि – “मुझे यह देखकर परम सुख- संतोष का अनुभव हो रहा है कि इस कृति के प्रणयन करते समय पथिक जी ने अपने नाम के अनुकूल श्रवण कुमार विषयक आधार भूत साहित्य की गहरी छान बीन की और अपनी शोध दृष्टि से श्रवण कुमार का प्रामाणिक जीवन वृत्त खोज निकाला। इसी के साथ-साथ उन्होंने संदर्भित स्थलों का सर्वेक्षण किया। वे जितमा श्रम करके इन दुर्गम स्थलों तक पहुँचे, वहाँ रुककर व्यापक जनसंपर्क करके जो तथ्य से ग्रहण किया, वह नि:संदेह अत्यंत सराहनीय है। इन खोजों पर पहले उन्होंने अपने शोध आलेख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित कराये, ताकि जन सामान्य द्वारा उनकी मान्यताओं की संपुष्टि हो सके। उसके पश्चात अपनी इस खोजों को इस महाकाव्य में काव्योपम ढंग से प्रस्तुत किया।”

