विदर्भ कुमार
लखनऊ:सार्थक कहानियों के लिए देश में अपनी अलग पहचान रखने वाले वरिष्ठ कहानीकार मुक्तिनाथ झा के दूसरे कथा संग्रह वंदे मातरम का विमोचन सुप्रसिद्ध पत्रकार एवं नूतन कहानियां के संपादक सुरेंद्र अग्निहोत्री ने किया इस अवसर पर युग जागरण हिंदी दैनिक के संपादक अनिल त्रिपाठी, बुंदेली मधुकर पत्रिका के प्रधान संपादक विदर्भ कुमार,पत्रकार कमलेश यादव ,अनिल चन्द्र की उपस्थिति में संपन्न हुआ। विमोचन समारोह में अपनी कृर्ति वंदे मातरम‘ के संदर्भ में लेखक मुक्ति नाथ झा ने बताया कि इस कहानी संग्रह में 28 कहानी संग्रहित है। इन कहानियों में मानव मूल्यों के साथ संवेदनशील ढंग से समाज को प्रेरित करने का प्रयास किया गया है।इन कहानियों के पात्रों के स्वर में पीड़ा भी है और प्रतिरोध भी; संघर्ष भी है और टूटते सपनों का दर्द भी। प्रत्येक पात्र की सामाजिक स्थिति और परिवेश के अनुरूप भाषा अपनी कहानियों के माध्यम से पाठकों के मन में गहरी हलचल पैदा करती हैं और स्पष्ट संदेश भी देती हैं।
नूतन कहानियां के संपादक सुरेंद्र अग्निहोत्री ने लेखक बधाई देते हुए कहा
जीवन से बड़ा रंगमंच और क्या होगा? इस रंगमंच पर दुख-सुख, विडंबना, नाटकीयता, ईर्ष्या-द्वेष, लोभ-मोह, चालाकी और स्वार्थ सब कुछ देखने को मिलता है। यहां हर व्यक्ति अपने-अपने किरदार में है और हर किरदार की अपनी एक कहानी है। सार्थक कहानीकार मुक्तिनाथ झा की इन कहानियों में प्रेम है, रिश्तों की बदलती परिभाषाएं हैं और बदलते जीवन-मूल्य भी। लेखक ने अपने पात्रों और घटनाओं के माध्यम से बदलते समय के साथ रिश्तों में अपनापन, संवेदना और भरोसा किस तरह स्वार्थ, सुविधा और मुनाफे के सामने कमजोर पड़ने लगते हैं को अपना कथा का केन्द्र बिंदु बनाकर उन भावनाओं , आशीष और अपनत्व को भी अजागर किया है जो मुनाफे और स्वार्थ के तराजू पर तौले जाने लगा हैं।सार्थक कहानीकार मुक्तिनाथ झा का लेखन आत्मविश्वास, नैतिकता एवं जीवन में सटीक निर्णय लेने की क्षमता विकसित करता है।संग्रह की कहानियां रोजमर्रा के जीवन और हमारे आसपास के परिचित पात्रों से अपना कथ्य तलाशती हैं। इसे पढकर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जा सकते है। इस संग्रह की हर एक कहानी महत्त्वपूर्ण है, जो आरंभ से अंत तक पाठक का ध्यान आकर्षित करती है।

