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नित्यनाम तिवारी

उत्तर प्रदेश के लोगों जिले में अनेक ऐसे दुर्लभ एक हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन पुरातात्विक स्थल है जिसका ऐतिह दृष्टि राममेषों की ओर तो उत्तर प्रदेश विभाग है और केद्रीय पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने हो इनके संरक्षण की कोई पहलवा दिलचदिवाई एवं सुरक्षा के अभाव में बर्राष्ट्र की भारी मात्रा में बोरी पती जा रही है या फिर नष्ट होता ही है।

जिला प्रशासन मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर मार्ग पर एक स्थान है हादूर-दूर तक फैली पर्वतमालाओं के बीच देतवा नदी सचिने जंगलों से घिरा हुआ है यह सीमान्त स्निग्ध स्थत कभी भारतीय इतिहास में बौद्ध धर्म के पतन के पश्चात् हिन्दू धर्म को पुनः प्रतिष्ठा करने वाले शिव एवं विष्णु पन्त राजाओं की यह नियम एवं कि पास का यह स्थान पूर्व मध्यकालीन ऐतिहासिक बों की दृष्टि से बना ही महत्वपूर्ण है।

इन पुरावशेषों में सबसे महत्वपूर्ण है एक हजार वर्ष से भी प्राचीन मन्दिर यह नबी शहों के उत्तराई से लेकर दसवी सती के पूर्वाद्ध के बीच महाप्रतापी राजा कोटियमंन द्वारा निर्माण कराया गया था। पत्थरों वाला यह मन्दिर एक ऊंने वर्गाकार चबूतरे पर बना हुआ है पतमाताओं के बीच दूर से ही इसके शिखर दिखाई देते हैं सताब्दियों तक धूप वर्षा तूफान, धूल आदि के कारण इसके शिखर काले पड गये हैं और मन्दिर का ऊपरी अधिकांश भाग टूट गया है तथा दुर्लभ मूर्तिया भी काफी नष्ट पाम होती जा रही है। यह मन्दिरबा की दृष्टि से खजुराहो के मन्दिरों से कम महत्व का नहीं है। यहा इस शिवमन्दिर की दीवारों पर मस्ति शिलालेख के पृष्ठोसते है और बुन्देलखण्ड के दक्षि हास में और कुछ नये पृष्ठ जुड़ सकते हैं। मण्डलाकूल इस मन्दिर के भीतर गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर गंगा और यमुना की दुर्लभ मूर्तियां है। प्रवेशद्वार पर बाएं-याएं उपरजीचे पूरा पैनल भारतको एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को उजागर करता है जो कि है।

भारतीय संस्कृति में गंगा और यमुना का महत्व महाभारत के पौरा शिक काल से लेकर आज तक चला जा रहा है। समय रहते इन पौरा गिक महत्व की दुर्लभ मूर्तियों की रक्षा नहीं की गई तो वे अन्त मूर्तिया जो उत्तर भारत की अमूल्य तथा दुर्लभ हैके लिए नष्ट हो सकती हैं और भारतीय संस्कृति एवं हिन्दू धर्म, दर्शन, इतिहास, पुराण के सन्दर्भों को उजागर करने वाले ये जीवन्त तथ्या के गाल में हमेशा के लिए समा सकते हैं। ऐतिहासिक कालक्रम •पुर जिले के भीतर गांव के 8वीं शती के गुप्त कालीन मन्दिर के बाद यदि किसी भी मन्दिर को स्थान प्राप्त हो सकता है, तो इसी गैराहा के मन्दिर को ।

छठी शताब्दी में हर्णों के बबर आक्रमणों के द्वारा न केवल वंश का ही अन्त हो गया वरन गुप्तकालीन समृद्धिशील कला वैभव के भारत जैसे देश में तस्कर की यह समस्या बड़ा गम्भीर रूप लेती जा रही। है। एक ओर सोना, इलेक्ट्रानिक सामान आदि अवैध रूप से पहुंच रहे हैं वहीं दूसरी ओर पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं दुर्लभ मूर्तियां आदि के देश के बाहर चले जाने से दिनों-दिन हमारा देश सांस्कृतिक समृद्धि की दृष्टि से कमजोर होता जा रहा है।

झांसी से 175 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में खजुराहो नामक स्थल पर दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी में चन्देल राजाओं द्वारा निर्मित 85 मन्दिरों में से शेषमात्र कुछ कन्दर्य महादेव, पार्श्वनाथ, लक्ष्मण, चित्रगुप्त, देवी जगदम्बा, चतुर्भुज आदि मन्दिर कला, भक्ति और शृंगार के लिए विश्वभर में विख्यात हैं। प्रतिवर्ष लाखों भारतीय एवं विदेशी पर्यटक विश्वभर से इन मन्दिरों को दूर-दूर से देखने आते हैं। भारतीय एवं विदेशी कलाविदों द्वारा इन मन्दिरों के महत्व पर विश्व की अनेक भाषाओं में सैकड़ों ग्रन्थ भी प्रकाशित हो चुके हैं, किन्तु खजुराहो के मन्दिरों के शिल्पियों एवं मूर्तिकारों के पूर्वजों द्वारा निर्मित गैराहा का यह शिव मन्दिर खजुराहो के शिल्प वैभव के उद्भव की जो एकमात्र अनुपम धरोहर है, आज उपेक्षा का शिकार है। देखना है। कब इसके दिन बहुरते हैं और देश के पर्यटक मानचित्र में इस मंदिर को कब स्थान मिलता है।प्रसिद्ध इतिहासकार वर्णन करता है कि ऐसा भव्य मन्दिर बनवाने में दो सौ वर्ष लगेंगे और दस करोड़ दीनार (स्वर्ण मुद्राएं) खर्च होंगी। आश्चर्य है कि नवीं से दसवीं शती के मध्य निर्मित यह शिव मन्दिर ग्यारहवीं शती के प्रारम्भ में महमूद गजनवी जैसे विदेशी बर्बर आक्रान्ताओं से कैसे बचा रहा। यह अभी भी शोध का विषय हो सकता है ।

इधर कुछ वर्षों से मन्दिर से सटा हुआ यहां एक इण्टर कालेज खुल गया है जिसके कारण यहां दिन में थोड़ी बहुत चहल-पहल होने लगी है, फिर भी पिछड़ा होने के कारण यह स्थान बिलकुल वीरान है तथा आबादी रहित है। बिजली न होने के कारण दिन में ही इस स्थान पर झांसी से बस या कार द्वारा पहुँचा जा सकता है।

किसी भी राष्ट्र की प्राचीन कला सम्पदा उसके इतिहास और अवि भाज्य संस्कृति की आत्मा होती है। यह कला सम्पदा इतिहास से सीधा साक्षात्कार कराती हुयी हमारे तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक चरित्र को भी उजागर करती है।

आज चाहे यूरोप हो या अमेरिका दुनियां का शायद ही कोई देश हो जो तस्करी के रोग से बचा हो किन्तु विशाल सांस्कृतिक धरोहर वाले

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