-सुरेन्द्र अग्निहोत्री
हिन्दी ग़ज़ल संग्रह ‘शाश्वत संवाद’ के रचनाकार नसिर अली ‘नदीम’ की प्रथम कृति है। हिन्दी ग़ज़ल संग्रह ‘शाश्वत संवाद’ में गजलकार ने जीवन के यथार्थ तथा सामाजिक विद्रूपताओं के साथ-साथ मानव मूल्यों को उभारने का भरसक प्रयास किया है। संक्षिप्तता, भावात्मक ऋजुता तथा वैयक्तिकता पर आधारित गजलों को जब ़ पाठक शब्द ही नहीं अपितु भाव पक्ष के आधार पर मूल्यांकन करेगा तो निश्चित ही हृदय को प्रभावित किये बिना नहीं रह पायेगी। नई पीढ़ी के जिन रचनाकारों ने हिन्दी ग़ज़लों को नई दिशाओं की ओर अग्रसर करते हुए एक काव्य विधा के रुप में सम्मानपूर्ण स्थान दिलाने के लिए सतत प्रयास किया है, उनमें में दुष्यन्त कुमार की श्रख्ला मंे नासिर अली ‘नदीम’ का नाम अवश्य ही शामिल किया जायेगा ।
‘शाश्वत संवाद’ में शामिल 101 ग़ज़लों में प्रेम, भक्ति, समर्पण, सहनशीलता, शालीनता आत्मीयता, समसामयिक यथार्थ , प्रकृति, लोकसंस्कृति आदि को बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से सजीव चित्रण श्रेष्ठतम भावों के समायोजन से किया है। रचनाकार नसिर अली ‘नदीम’ की ग़ज़लों में सहज, मौलिकता आकर्षित करती है। अभिव्यक्ति की चारुता विशिष्ट उल्लेखनीय है। संग्रह में प्रेमभाव के कतिपय उदाहरण देखें -‘‘द्वेश से अवसाद उपजे, हर्ष उपजे प्रेम से/है कुछ ऐसी ही निराली पाठशाला प्रेम की/प्रेम से बढ़के नहीं कोई भी उपलब्धि ‘नदीम’/ जिसे प्रेम का बल मिला हो जगत में/देंगे ‘नदीम’ प्रेम तो पायेंगे प्रेम ही/प्रेम निष्फल नहीं होता है कभी भी वो ‘नदीम’/ इसमें भी मुझको प्रेम की लीला दिखाई दे/जब अपना प्रेम है सागर का जल तो बतलाओ/‘नदीम’ उनसे जब प्रेम परिणाम पूछो/प्रेम का जिसमें भाव हो/जीवन नइया प्रेम खिवइया/पर प्रेम सारे धर्मो का निष्कर्ष है तो है/प्रेम के आधीन जो भी जल हुआ/प्रेम उसके मोक्ष का साधन हुआ/प्रेम से बढ़कर और नहीं कुछ बात ये जानी मानी है/प्रेमपथ के इस पथिक को जब कभी संकट मिले’’ आदि। इस तरह प्रेम के अतिरिक्त ‘शाश्वत संवाद’ में रचनाकार नसिर अली ‘नदीम’ की वर्णित उच्च भावों पर भी एक अलग से आलोचनात्मक ग्रन्थ लिखा जाय तो कुछ भी अप्रत्याशित नहीं होगा।
‘शाश्वत’ संवाद की छोटी बह्र वाली ग़ज़लों में सिद्धान्तों का निरूपण ‘नदीम’ जी ने कितने प्रभावी ढंग से किया है, देखने योग्य है उनकी ग़ज़लों में शुद्ध साहित्यिक संस्कृत शब्दावली के माध्यम से उच्च भावभूमि को प्रतिष्ठित करने में समर्थ कुछ पंक्तियाँ देखिये-
व्यक्ति जब पक्षपात करता है
वस्तुतः आत्मघात करता है
बोल उठते हैं उससे जड़ प्रस्तर
जो उन्हें आत्मसात करता है
जगत में फैले हुए प्रदूषित वातावरण से खिन्न तथा निराश होकर कवि ने समाधान पाने के लिए परिस्थितियों के समक्ष प्रश्नावली उपस्थित की है-
क्यों विषैला हुआ आज कण-कण कहो
किसने फूँका है ये मंत्र-मारण, कहो!
वास्तविक चाह दिखती नहीं है कहीं
फिर मिटे भी तो कैसे प्रदूषण, कहो!
ग़ज़ल के एक शेर में सम्पूर्ण अन्तर्कथा को समाहित करने की कला के मर्मज्ञ ‘नदीम’ जी अपने वर्णन को कितना चमत्कृत कर देते हैं, देखने योग्य है-
सत्य तो सत्य के ही संग रहेगा निश्चित
चाहे पैताने खड़े हों कि सिरहने कौरव
शोक मन में हो तो क्या वाटिका करती है अशोक
शोक ही शोक सिया को जो नहीं हैं राघव
नसिर अली ‘नदीम’ जी की ग़ज़लों में कुछ ऐसे विशिष्ट भाव भी अंकित हैं जिसमें सत्य और यथार्थ का अनूठा संगम है। उन भावों में पाठक के हृदय को झकझोरने की पूर्ण सामर्थ्य है।
रचनाकार नसिर अली ‘नदीम’ अपने प्रकथन में स्वंय लिखते है- कविता में मुझे ग़ज़ल ने सर्वाधिक प्रभावित किया था, इसी कारण हिन्दी-उर्दू की अन्यान्य काव्य-विद्याओं को जानने समझने के अलावा ग़ज़ल की बारीकियों से अवगत होने के लिए उर्दू के सुविख्यात शाइरों के दीवान तो पढ़े ही, अरूज़ (उर्दू-छंदशास्त्र) की दर्जनों पुस्तकों का गहन अध्ययन भी किया। फ़ारसी-निष्ठ उर्दू में लिखी गई अरूज़ की पुस्तकों को बार-बार पढ़ने और समझने में समय तो लगा लेकिन उर्दू-शाइरी में प्रचलित बहरें और उनकी बारीकियाँ मन मस्तिष्क में पूरी तरह रच-बस गईं। उन्हीं दिनों (1980 के दशक में) हिन्दी में भी ग़ज़लों के सृजन का एक नया उत्साह और नई उमंग देखने में आ रही थी। अधिकांश ग़ज़लें दुष्यंत कुमार त्यागी की तरह की ही कही जा रही थीं। उनकी भाषा-शैली भी कुछ उसी प्रकार की होती थी। तभी, एक विशेष प्रेरणावश, मैंने उर्दू-शाइरी के तमाम नियमों का पालन करते हुए विशुद्ध-हिन्दी में कुछ ग़ज़लें प्रेम और अध्यात्म की भावभूमि से जुड़ी हुई कहीं, जो काफ़ी लोकप्रिय हुईं। उनमें यह गजल महत्वपूर्ण है-
कोई अपना, न पराया है यहाँ पर कोई
ये समझकर जो जिया, उसने ही पाया जीवन।
चाँद धरती पे वही लोग हैं, सूरज हैं नदीम
दीपकों जैसा जिन्होंने है बिताया जीवन।
साहित्य निलय प्रकाशन,कानपुर
रचनाकार नसिर अली ‘नदीम’
मूल्य/300
पृष्ठ-158

