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परिचय

हल्दी (कुरकुमा लोंगा) (कुलः जिंजिबिरेसिया) को अपने धार्मिक कार्यों के अतिरिक्त मसाला, रंग सामग्री, औषधि और उपटन के रूप में उपयोग किया जाता हैं। भारत विश्व मेंहल्दी का सबसे बड़ा उत्पादक एवं उपभोक्ता देश है। आन्ध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, उड़ीसा, कर्नाटक, पश्चिम बंगालगुजरात, मेघालय, महाराष्ट्र, असम आदि हल्दी उत्पादित करने वाले प्रमुख राज्य हैं। निरंतर बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण इस की बढ़ती हुई मांग के अनुरूप पूर्ति न कर पाना भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए एक चिन्ता का विषय है। हल्दी की फसल के उत्पादन में गिरावट के प्रमुख कारणों में से एक इनको हानि पहुंचाने वाले रोग, कीट एवं सूत्रकृमि की समस्याओं के प्रति कृषकों का उचित समाधान न जानना है। अतः प्रस्तुत लेख में हल्दी को हानि पहुंचाने वाले रोग, कीट, सूत्रकृमि तथा उनके प्रबन्धन एवं फसलोत्तर भंडारण हेतु उचित विधियों का उल्लेख किया गया है।

रोग

पर्णदाग (लीफ ब्लोच) रोग

यह रोग टापहीना मेकुलान्स नामक कवक के द्वारा होता है। इसके संक्रमण से छोटे, अण्डाकर, आयताकार या अनियमित भूरे रंग के दाग पत्तियों पर पड़ जाते हैं जो जल्दी ही गहरे पीले या भूरे रंग के हो जाते हैं जिससे पौधे की पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैंइस रोग की अत्यधिकता से पौधों में सूखापन आ जाता है जिसके फलस्वरूप फसल की पैदावार में कमी आती है।

प्रबन्धन

संक्रमित पत्तियों को तोड़कर जला देना चाहिएखेत में रोग के लक्षण दिखायी देने पर मेनकोजेब (0.2%) या कार्बेडिजम (0.3%) का एक माह के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए।

पर्ण चित्ती (लीफ स्पोट) रोग

यह रोग कोलीटोट्राइकम केप्सीसी के द्वारा होता है। इसके संक्रमण के कारण नई पत्तियों के ऊपरी भाग में विभिन्न आकार की भूरे रंग की चित्ती पड़ जाती हैं। यह चित्ती बाद में एक दूसरे से मिलकर पूरी पत्ती पर फैल जाती है। रोग ग्रसित पौधे प्रायः सूख जाते हैंइस कारण प्रकन्द अच्छी तरह विकसित नहीं हो पाता।

प्रबन्धन

बुआई के लिए रोग मुक्त प्रकन्दों का चयन करना चाहिए• प्रकन्दों को भंडारण से पहले मेनकोजेब (0.3%) से उपचारित करना चाहिए। फसल कटाई के बाद बची हुई संक्रमित पौध सामग्री को वहां से निकाल कर जला देना चाहिए। रोग के लक्षण दिखाई देने पर मेनेकोजेब (0.2%) या कार्बेनडिजम (0.3%) का एक माह के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए।

राइज़ोम गलन रोग

यह रोग पाइथीयमग्रेमिनिकोलम या पी अफानिडेरमाटम के द्वारा होता है। इस रोग के लक्षणों में आभासी तने का कोलर भाग मुलायम/नर्म पड़ कर पानी सोख लेता है। जिसके कारण प्रकन्द सड़ जाता है। अतः पौधा मर जाता है।

प्रबन्धन

• बुआई के लिए रोग मुक्त प्रकन्दों का चुनावभंडारण से पहले प्रकन्दों को मेनकोजेब (0.3%) से उपचारित करना चाहिए। • खेत में पानी के जमाव को रोकने के लिये उपयुक्त नाली बनाकर पानी का निकास करना चाहिए। बुआई वाले स्थान को सौरीकरण करना चाहिए। बुआई के समय तथा बुआई के 45 दिन बाद ट्राइकोटरमा हरजियानम (10′ सी एफ यू/ग्राम) के साथ 50 ग्राम नीम केक से उपचारित करना चाहिए। बेडो पर जैविक छपनी तथा आयल केक को मृदा को उन्नत करने तथा जैव नियन्त्रण कारकों की वृद्धि हेतु उपयोग करना चाहिए। • उपयुक्त फाइटोसेनिटेशन माध्यमों को अपनाना चाहिए। . खेतों में रोग के लक्षण दिखाई देने पर कोपर ओक्सीक्लोराइड (0.2%) से उपचारित करना चाहिए।

कीट

तना भेदक

तना भेदक (कोनोगीथस पंक्टिफैरीलिस) हल्दी की फसल को हानि पहुचाने वाले प्रमुख कीट हैं। इसका लार्वा आभासी तने को भेद कर उसकी आन्तरिक कोशों को खा लेता हैइसके द्वारा भेदित तने के छिद्र से फ्रास निकलता हैपौधे की ऊपरी भाग की पत्तियां पीली पड़ जाती हैंइसका वयस्क मध्यम आकार का होता है। जिसमें 20 मि. मीटर शलभयुक्त नारंगी पीले रंग के पंख होते हैं। जिस पर सूक्ष्म काली चित्ती के निशान होते हैं। इसके लार्वा हल्के भूरे रंग के होते हैं।

प्रबन्धन

मेलियियोन (0.1%) या लेमडा –साहहेलोथ्रीन (0.0125%) का जुलाई से अक्तूबर में मध्य माह के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए। अगर पौधे पर इस कीट के लक्षण दिखाई दे तो तुरन्त छिड़काव करना चाहिए

राइज़ोम शल्क

राइज़ोम शल्क (अस्पिडियल्ला हारतीया) खेत के अन्दर तथा भण्डारण में प्रकन्दों को हानि पहुँचाते हैं। इसकी वयस्क मादा गोलाकर (लगभग 1 मि.मीटर), हल्के भूरे रंग की होती है। यह प्रकन्दों का सार चूस लेते हैं जिससे वह सूख कर मुरझा जाते हैं जिसके कारण इसके अंकुरण में समस्या आती है।

प्रबन्धन

फसल की कटाई समय पर करनी चाहिए। कीटग्रसित प्रकन्दों को भंडारण न करके उन्हें नष्ट कर देना चाहिए। बीज प्रकन्दों को क्विनालफोस (0.075%) मे डुबो कर उपचारित करने के पश्चात लकड़ी के बुरादे तथा स्टूकनोस नकसबोमिका की पत्तियों के साथ भंडारण करना चाहिए।

अप्रधान कीट

लीफ फीडिंग बीटल (लीमा स्पीसीस) के वयस्क और लार्वे हल्दी के पौधों की पत्तियों को खा लेते हैं विशेषकर, मानसून काल और उसके समकक्ष यह फसल को ज्यादा हानि पहँचाते हैं। तना भेदक के प्रबन्धन के लिए मैलिथियोन (0.1%) का छिड़काव इस कीट के नियन्त्रण के लिए भी पर्याप्त है। लेसविंग वर्ग (स्टीफानिटस टिपिकस) पत्तियों को हानि पहुँचाते हैं जिसके कारण पत्तियाँ सूख जाती हैं। देश के शुष्क क्षेत्रों में, विशेषकर मानसून के बाद यह कीट ज्यादा खतरनाक होते हैं। इन कीटों को नियन्त्रण करने के लिए डिमेथोयड (0.05%) का छिड़काव करना चाहिए। थ्रिप्स (पानकेटोथ्रिप्स इंडिकस) विशेषकर पत्तियों को हानि पहुँचाती हैं जिसके कारण पत्तियाँ मुड़ने लगती हैं तथा हल्की पड़कर धीरे-धीरे सूख जाती हैं। देश के शुष्क क्षेत्रों में, विशेषकर मानसून के बाद यह कीट ज्यादा हानि पहुँचाते हैं। इन कीटों को नियन्त्रण करने के लिए डिमेथोयट (0.05%) का छिड़काव करना चाहिए।

सूत्रकृमि

सूत्रकृमि अक्सर जड़ ऊतकों के कार्यो में बाधा पहुंचाते हैं। उनके द्वारा संक्रमित पौधों की जड़ें मिट्टी से उचित पोषण एवं पानी नहीं ले पाती हैं जिसके कारण पौधे के ऊपरी भागों में लक्षण उत्पन्न होते हैं जैसे, पोषण की कमी, शुष्कता, लवण की अधिकता व अन्य तनाव की परिस्थितियां उत्पन्न होती हैंपौधों की वृद्धि रुक जाती है, पत्तियां पीली पड़ जाती हैं तथा शाखायें कम निकलती हैंइसकी फसल को मुख्यतः निम्नलिखित सूत्रकृमि हानि पहुंचाते हैं

जड़ गांठ सूत्रकृमि (मेलोडोगाईन स्पी.)

यह सूत्रकृमि जड़ों के अन्तर्जीवी हैंइस सूत्रकृमि की कई उपजातियां हैं, परन्तु मेलोडोगाईन इनकॉगनिटा तथा एम. जावानिका ही मुख्यतः हल्दी को हानि पहुँचाती हैं। सूत्रकृमि द्वारा संक्रमित जड़ों में गाठे बन जाती हैं। प्रायः इन गाठों को अलग नहीं किया जा सकता। मिट्टी में रहकर यह नई जड़ों को भेद कर उनके अन्दर घुस जाते हैं तथा पानी और खाना ले जाने वाली कोशिकाओं पर आक्रमण करते हैं। यह सूत्रकृमि अपना जीवनचक्र लगभग 25-30 दिनों में पूरा कर लेते हैं। तत्पश्चात यह सूत्र कृमि गोलाकार होकर जड़ों में गांठे पैदा करते हैं। इन गाठों के कारण पौधे मृदा में पोषक तत्व तथा पानी की उपलब्धता होते हए भी पर्याप्त मात्रा में उसे ग्रहण नहीं कर पाते।

जड़ विक्षत सूत्रकृमि (प्राटाइलेंकस स्पी.)

यह सूत्रकृमि मुख्यतः हल्दी को हानि पहुंचाते हैंइस सूत्रकृमि की बहुत सी उपजातियां भारत में पाई जाती हैं। रोगी पौधे के ऊपरी भागों के लक्षण अस्पष्ट होते हैं। पौधे के ऊपरी भागों की वद्धि रुकना पीलापन तथा सबसे प्रमुख लक्षण, जड़ों के ऊपर धब्बे पड़ना है जिनकी परिसीमा सूत्रकृमि जनसंख्या घनत्व के साथ बदलती रहती हैं। धब्बे दिखने में छोटे, लम्बे तथा पनीले होते हैं तथा शीघ्र ही भरे या लगभग काले हो जाते हैं।

प्रबन्धन

बुआई के लिए सूत्रकृमि रहित प्रकन्दों का उपयोग करना चाहिए।

संक्रमित प्रकन्दों को गरम पानी (50°c) में 10 मिनट तक डुबो कर उपचारित करना चाहिए। खेती के लिये चयनित जगह का सौरीकरण करना चाहिए। बेडों पर जैविक छपनी तथा आयल केक को मृदा को उन्नत करने के अतिरिक्त जैव नियन्त्रण कारकों की वृद्धि हेतु उपयोग करना चाहिए। बुआई के समय पौकोनिया कलामाइडोस्पोरिया (20 ग्राम / बेड 10° सी एफ यू / ग्राम) से उपचारित करना चाहिए। जहां जड़गांठ सूत्रकृमि की समस्या है वहां आई आई एस आर – महिमा प्रजाति को खेती के लिये चुनना चाहिए।

बीज राइज़ोम का भण्डारण

वह राइजोम जो बीज के रूप में उपयोग होते हैं, उन का भंडारण हवादार कमरे में पतों से ढक कर करते हैं। बीज राइज़ोम को गड्ढों में लकड़ी का बुरादा, बालू और स्टाइकनोस नकसबोमिका (कन्जीरम) के पत्ते रख कर भी भंडारण किया जा सकता है। इन गड्ढों को लकड़ी के तख्ते से ढक देते हैं। इन तख्तों को हवादार बनाने के लिए इनमें एक या दो छेद कर देते हैं। शल्क ग्रेसित राइज़ोम को 15 मिनट तक क्विनालफोस (0.075%) तथा कवग ग्रेसित राइज़ोम को मैनकोजेब (0.3%) से उपचारित करते हैं।


प्रस्तुत :अंजु अग्निहोत्री, ए -305, ओ.सी.आर.बिल्डिग, विधान सभा मार्ग, लखनऊ 

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