प्रज्ञा पाण्डेय मनु
घर का कोना कोना साफ करो | अच्छी बात है साफ होना ही चाहिए लेकिन त्योहारों के
समय मे जब वर्किंग क्लास को ऑफिस मे भी देर तक रुकना होता है फिर घर का कोना
कोना साफ करना या करवाना काफी कठिन और मूड को तनाव देने वाला होता है | घर को
थोड़ा थोड़ा साप्ताहिक , मासिक और वार्षिक सफाई के हिसाब से साफ करें | किसी खास
दिन ही सब साफ हो इस परंपरा पर पुनर्विचार होना ही चाहिए |
जब परिस्थितियाँ बदल गई हैं, तो उत्सव मनाने के तरीकों में बदलाव क्यों नहीं होना चाहिए?
मैं यह नहीं कह रही कि परंपराएँ छोड़ दीजिए। मेरा आग्रह केवल इतना है कि उन्हें समझिए,
उनके उद्देश्य को पहचानिए और फिर तय कीजिए कि आज उन्हें किस रूप में निभाना
सबसे उचित होगा।
हर पुरानी परंपरा अवैज्ञानिक नहीं होती और हर नई चीज बेहतर नहीं होती। जरूरत है
विवेकपूर्ण चुनाव की—न अंधानुकरण, न अंधविरोध।
त्योहार ऐसे भी मनाकर देखिए!
कल्पना कीजिए, दीपावली पर परिवार के सभी सदस्य मिलकर घर सजाएँ। स्वच्छता रखें, दीप
जलाएँ, पूजा करें और एक-दूसरे के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें। सुगंधित धूप या अन्य सामग्री
का उपयोग अपनी सुविधा और सुरक्षा के अनुसार करें। फिर सब लोग मिलकर सादा,
स्वादिष्ट और संतुलित भोजन बनाएँ या साथ बैठकर खाएँ।
स्विगी और जोमैटो से खाना मँगवाने में कोई बुराई नहीं, लेकिन कभी-कभी परिवार के सभी
सदस्य मिलकर भी रसोई सँभालें। कोई सब्जी काटे, कोई आटा गूँधे, कोई मेज सजाए और
कोई बर्तन समेटे। त्योहार का श्रम भी साझा हो और आनंद भी।
और क्यों न कभी त्योहार पर किसी गाँव की सैर की जाए? किसी जिम्मेदार ग्रामीण पर्यटन
केंद्र या स्थानीय परिवार के आतिथ्य में ग्रामीण जीवन को करीब से समझा जाए। स्थानीय
नियमों, निजता और मेजबान की सहमति का सम्मान करते हुए मिट्टी के घर, खेत, चूल्हे पर
बना भोजन और गाँव की जीवनशैली का अनुभव लिया जाए।
बच्चे, जो आलू को अब तक केवल सुपरमार्केट की टोकरी में देखते आए हैं, जानें कि वह
मिट्टी से कैसे निकलता है। मटर की फली पौधे पर कैसे लगती है, सरसों के खेत कैसे
लहलहाते हैं और बीज से तेल बनने तक की प्रक्रिया क्या है—यह सब उनके लिए किसी
रोमांचक पाठशाला से कम नहीं होगा।
ऐसा अनुभव केवल मनोरंजन नहीं, प्रकृति, कृषि और मेहनत के प्रति सम्मान भी सिखा
सकता है। हाँ, ग्रामीण परिवारों की दिनचर्या को केवल हमारे मनोरंजन का साधन न बनाया
जाए; उनके श्रम और आतिथ्य का उचित सम्मान भी हो।
त्योहारों पर जरूरतमंदों की सहायता करना, बुजुर्गों के साथ समय बिताना, बच्चों को
लोककथाएँ सुनाना, परिवार के साथ खेलना या किसी पुराने मित्र से मिलने जाना भी उत्सव
का हिस्सा बन सकता है।
आखिर त्योहार का असली आनंद महँगे पकवानों, रोशनी की चकाचौंध और रस्मों की लंबी
सूची में ही तो नहीं है।
परंपरा का सम्मान करें, विवेक का भी इस्तेमाल करें
हमारे पूर्वजों ने अपने समय की परिस्थितियों में जीवन को व्यवस्थित करने, समाज को
जोड़ने और आनंद के अवसर बनाने के लिए अनेक परंपराएँ विकसित कीं। उनके प्रति
सम्मान होना चाहिए। लेकिन सम्मान का अर्थ यह नहीं कि हम हर परंपरा को उसके मूल
उद्देश्य और वर्तमान परिस्थितियों पर विचार किए बिना निभाते रहें।
समय के साथ समाज बदलता है, साधन बदलते हैं, पर्यावरण बदलता है और परिवारों की
जरूरतें भी बदलती हैं। ऐसे में परंपराओं के रूप में बदलाव आना स्वाभाविक है।
यदि किसी परंपरा से प्रेम, सद्भाव, कृतज्ञता और सामूहिक आनंद बढ़ता है, तो उसे संजोएँ।
यदि उसके किसी पुराने तरीके से पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है, अनावश्यक खर्च बढ़ता है
या परिवार के किसी सदस्य पर असमान बोझ पड़ता है, तो उसका बेहतर विकल्प खोजें।
त्योहारों को बोझ नहीं, आनंद का अवसर बनाइए। आस्था को विवेक से जोड़िए, परंपरा को
समय के साथ चलने दीजिए और उत्सव में प्रकृति तथा मनुष्य—दोनों के लिए जगह रखिए।
आखिर त्योहार हमारे जीवन को सुंदर बनाने के लिए हैं, जीवन को त्योहारों की रस्मों के बोझ
तले दबाने के लिए नहीं।
तो अगली बार त्योहार मनाएँ, जरूर मनाएँ—लेकिन केवल लकीर के फकीर बनकर नहीं, बल्कि
सोच-समझकर, मिल-जुलकर और खुशियाँ बाँटकर।

