श्याम कुमार
आदर्श सांसद के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी को कभी नहीं भूला जा सकता है।
उनके-जैसा आदर्श सांसद मैंने कोई नहीं देखा। संसद के हर सत्र में वह पूरे
समय अपनी सीट पर विद्यमान रहते थे। एक बार लोकसभा का विशेष अधिवेशन हुआ
था। संगमा अध्यक्षता कर रहे थे। उस अधिवेशन के अन्त में अटलजी ने अपने
भाषण में कहा था कि नए सांसदों ने जिस प्रकार प्रभावपूर्ण भाषण किए एवं
रचनात्मक सुझाव दिए, उससे उन्हें बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ है। वह प्रत्येक
भाषण ध्यानपूर्वक सुना करते थे। अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमन्त्री
नहीं हुए थे और लखनऊ से लोकसभा के सदस्य निर्वाचित थे तो लगभग हर महीने
वह लखनऊ आया करते थे तथा जनता की समस्याएं सुनते थे। अटलजी के पास लोग
बिना रोकटोक पहुंचते थे तथा वह सबकी समस्याएं सुनकर उन्हें हल कराने का
पूरा प्रयास किया करते थे।
लखनऊ में मेरे सामने एक बार कुछ लोगों ने अटलजी से शिकायत की कि लखनऊ के
अधिकांश विधायक न तो अपने क्षेत्र में जाते हैं और न जनता की समस्याएं
सुनते हैं। पहले तो अटलजी को विश्वास नहीं हुआ, किन्तु जब वहां मौजूद सभी
लोगों ने आरोप का समर्थन करते हुए यह कहा कि यदि विधायकों की तसवीर
क्षेत्र की जनता को दिखाई जाय तो वह उन्हें नहीं पहचान पाएगी तो अटलजी
बहुत दुखी हुए और बोले कि जनप्रतिनिधियों को हर समय जनता के बीच सेवक के
रूप में मौजूद रहना चाहिए। एक बार इलाहाबाद में अटल जी का आगमन हुआ था तो
मैं उनसे मिलने सरकिट हाउस गया तथा बराबर उनके साथ मौजूद रहा। मैंने देखा
कि वहां भी वह जनता की समस्याएं सुन रहे हैं और समस्याओं के निराकरण के
लिए निर्दिष्ट कर रहे हैं। वह पूरी फाइल बनाकर रखते थे।
अटल जी जब भी लखनऊ आते थे, मेरी प्रायः उनसे भेंट हुआ करती थी। आम के
मौसम में उनकी आम-पार्टी पत्रकारों में बहुत लोकप्रिय थी। चन्द्रिका देवी
मन्दिर के पास वह पत्रकारों को आमों की पार्टी दिया करते थे। उस समय उनसे
पत्रकारों के रोचक वार्तालाप होते थे। बाद में जब वह प्रधानमन्त्री बन गए
तो उस समय भी उनकी आम-पार्टी आयोजित हुई थी। लेकिन प्रधानमन्त्री के रूप
में उनकी जो कड़ी सुरक्षा-व्यवस्था हो गई थी, उसके परिणामस्वरूप उस पार्टी
में पहलेवाला आनन्द नहीं आ पाया था। अटलजी ने स्वयं इस बात पर नाराजगीभरा
दुख व्यक्त किया था कि उनकी इतनी अधिक कड़ी सुरक्षा-व्यवस्था हो गई है कि
वह घुटन महसूस करते हैं। बात बिलकुल सही थी तथा अटलजी के स्वभाव के
अनुरूप थी।
अटलजी का जीवन उन्मुक्त पहाड़ी नदी की भांति था। न कोई दिखावा, न कोई
आडम्बर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में ऐसे ही संस्कार
उनके व्यक्तित्व की नींव में थे। उस समय पत्रकारों का जीवन सादगीभरा एवं
राष्ट्रहित के प्रति समर्पित होता था। अटलजी दिल्ली में सुविख्यात
राष्ट्रीय दैनिक ‘वीर अर्जुन’ एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र
‘पांचजन्य’ के सम्पादक रहे। लेकिन ४० के दशक में लखनऊ में ‘स्वदेश’ एवं
‘राष्ट्रधर्म’ पत्रिका में उनका पत्रकार के रूप में तथा कवि एवं ‘संघ’ के
प्रचारक के रूप में जो समय व्यतीत हुआ, वह लखनऊवासियों के लिए अविस्मरणीय
रहेगा। उस समय जैसे वह लखनऊ में और लखनऊ उनमें समाहित हो गया था।
पत्रकारिता के प्रति वह इतना समर्पित थे कि ईंट पर कपड़ा लपेटकर तकिया की
तरह इस्तेमाल करते हुए अपने कार्यालय में जमीन पर सो जाया करते थे।
अटल बिहारी वाजपेयी की सफलता का एक बहुत बड़ा कारण उनका धैर्यवान एवं
मितभाषी होना रहा है। वह स्वयं बहुत कम बोलते थे, किन्तु उनके सामनेवाला
व्यक्ति चाहे जितनी देर अपनी बात कहता रहे, उसे रोकते नहीं थे और उसकी
पूरी बात सुनते थे। अटलजी के सहयोगी शिवकुमार ने एक बार मुझसे कहा था कि
उन्हें आश्चर्य होता है कि यदि कोई व्यक्ति देर तक फालतू बातें भी बोलता
रहे तो अटलजी निरन्तर उसकी बात सुनते रहते हैं। लोकतन्त्रीय व्यवस्था में
उनकी पूरी आस्था थी। वह विपक्ष को शत्रु नहीं, मित्र मानते थे। मत-भेद को
मन-भेद नहीं मानते थे। सोनिया गांधी अटलजी के प्रति सदैव कटु वचन बोलती
रहीं। एक बार उन्होंने उन्हें ‘झूठा’ व ‘गद्दार’ तक कह दिया था। किन्तु
अटलजी ने बदले में उनके-जैसा रवैया कभी नहीं अपनाया। सोनिया ने अटल जी की
इस उदारता का बहुत लाभ उठाया। अटल जी की अतिउदारता के कारण ही सोनिया
गांधी अपने ऊपर कार्रवाइयों से बचती रहीं। सोनिया गांधी ने अपने एक भाषण
में अटल-सरकार के प्रति अंग्रेजी में ऐसे शब्द कह डाले थे, जिनका आशय यह
था कि अटल-सरकार पूरी तरह निकम्मी व वाहियात है। अटलजी ने लोकसभा में उन
शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा था कि ऐसा प्रतीत होता है कि सोनिया गांधी
ने शब्दकोश से ढूंढ़-ढूंढ़कर अनुचित शब्दों का प्रयोग किया है। विपक्षी
नेता को ऐसे शब्दों का इस्तेमाल शोभा नहीं देता है। जिस प्रकार जवाहरलाल
नेहरू के मन में सरदार पटेल के प्रति तथा इन्दिरा गांधी के मन में
लालबहादुर शास्त्री के प्रति द्वेषभाव था, उसी प्रकार सोनिया गांधी अटलजी
के प्रति गहरे द्वेषभाव से ग्रस्त रहती थीं। किन्तु अटलजी उनके प्रति
सदैव सीमा से बहुत अधिक उदार रहे।
लोकतन्त्रीय व्यवस्था में अटलजी की आस्था का एक और उदाहरण है। उस समय
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सोमनाथ चटर्जी लोकसभा के अध्यक्ष
थे। एक बार लोकसभा में उनका संचालन ऐसा था, जो टी0वी0 के दर्शकों तक को
सही नहीं प्रतीत हुआ था। अटलजी भी लोकसभा में असहज हो गए थे और उन्होंने
लोकसभा अध्यक्ष पर पक्षपात-जैसा आरोप लगा दिया था। लेकिन सदन की
कार्यवाही समाप्त होने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी सोमनाथ चटर्जी के आवास
पर पहुंचे थे और अपनी कड़ी प्रतिक्रिया पर उनसे क्षमा मांगी थी। अटलजी का
स्वभाव इतना अधिक उदार था कि सभी उनसे संतुष्ट हो जाते थे। इसीसे जब
गुजरात में शंकर सिंह बघेला ने भाजपा में विद्रोह किया था तो भाजपा के
तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें मनाने के लिए
अटलजी को भेजा था।
कुछ लोगों में ऐसी सुंदर भाषण-क्षमता होती है कि जनता मंत्रमुग्ध होकर
उन्हें सुनती है। महादेवी वर्मा, डाॅ. रामकुमार वर्मा, आचार्य विष्णुकांत
शास्त्री आदि नाम इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। उनके भाषणों के समय प्रतीत
होता था, जैसे उनके कंठ में साक्षात सरस्वती का वास है तथा यह भी सिद्ध
होता था कि हिन्दी में अभिव्यक्ति की अपार क्षमता एवं शक्ति है! वर्तमान
समय में सुषमा स्वराज व नरेन्द्र मोदी में वह क्षमता मौजूद है। अटल
बिहारी बाजपेयी में वैसी ही चुम्बकीय भाषण-क्षमता थी तथा संसद में जब वह
बोलते थे, पूरा सदन शांत होकर उन्हें सुनता था। अपने को रोकते-रोकते भी
कांग्रेसी नेता अटलजी के भाषण की प्रशंसा कर बैठते थे। सार्वजनिक सभाओं
में अटलजी को सुनने के लिए अपार भीड़ उमड़ती थी। उनके भाषणों में अत्यंत
स्वाभाविक रूप में हास्य का पुट हुआ करता था। अटलजी ने न केवल अपने देश
में हिन्दी का मान बढ़ाया, बल्कि संयुक्तराष्ट्र में भी हिन्दी का ध्वज
बुलंद किया।

