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गंगा प्रकाश सिंह शेखावत

सीतापुर,सनातन धर्म की गौरवशाली परंपरा में ईश्वर के साथ भक्तों का रिश्ता केवल भय का नहीं, बल्कि अगाध प्रेम, सख् मित्रता
और वात्सल्य भाव का रहा है। हमारे यहाँ अपने इष्ट देव से मनोविनोद और भावपूर्ण उलाहना देने की एक प्राचीन और
समृद्ध परंपरा है। इसी भाव के वशीभूत होकर बागेश्वर पीठाधीश्वर पूज्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री
राम (12 कला) और लीला पुरुषोत्तम श्री कृष्ण (16 कला) के दिव्य स्वरूपों के अंतर को रेखांकित करते हुए एक सामान्य
टिप्पणी की थी।
चूँकि ब्रज के कुछ संतों और श्रद्धालुओं को इस उलाहना से ठेस पहुँची, तो बाबा धीरेंद्र शास्त्री जी ने एक सच्चे सनातनी संत
की तरह बिना किसी शर्त के तुरंत सार्वजनिक रूप से माफी मांग ली। इस क्षमा याचना के बाद यह विषय वहीं समाप्त हो
जाना चाहिए था।
परंतु, इस पूरे मामले पर देश के कुछ स्वघोषित ‘कृष्ण भक्त’ और सनातन विरोधी राजनेता—अखिलेश यादव, पप्पू यादव
और तेजस्वी यादव—जिस तरह मचल पड़े हैं, वह उनकी गहरी राजनीतिक हताशा को दर्शाता है। वे ऐसा व्यवहार कर रहे
हैं मानो केवल वही श्री कृष्ण के असली वंशज हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि इनका भगवान विष्णु के अवतार राम और
कृष्ण से कोई आत्मिक लगाव सरोकार नहीं है।
एक अधिवक्ता के रूप में मैं इन नेताओं से कुछ बुनियादी सवाल पूछना चाहता हूँ:

धार्मिक स्थलों से दूरी: अखिलेश यादव जी कभी अयोध्या तो जाते हैं, पर न हनुमानगढ़ी जाते हैं और न ही श्री रामलला के
दर्शन करते हैं। श्री कृष्ण जन्मभूमि मथुरा को मुक्त कराने के लिए उनके मुँह से आज तक एक शब्द नहीं निकला।
मेरा स्पष्ट मत:
हम सनातनी कभी भी श्री राम और श्री कृष्ण में कोई भेद नहीं करते। दोनों ही हमारे आराध्य भगवान विष्णु के पूर्ण अवतार
हैं। बाबा धीरेंद्र शास्त्री जी ने सहज भाव से जो कहा, उसमें कोई दुर्भावना नहीं थी और उन्होंने बड़प्पन दिखाते हुए माफी
भी मांग ली।
अखिलेश यादव, पप्पू यादव और तेजस्वी यादव को धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी का विरोध करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं
है। यदि उन्हें वास्तव में श्री कृष्ण के अपमान की चिंता है, तो वे सबसे पहले सनातन का सरेआम उपहास उड़ाने वाले अपने
प्रिय भाटी जैसे प्रवक्ताओं को पार्टी से बाहर निकालें और उनके खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करवाएं।
यह विवाद धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि केवल और केवल वोट बैंक और यादव मतदाताओं को रिझाने के लिए खेला जा
रहा एक घटिया राजनीतिक ढोंग है, जिसे देश का सनातनी समाज भली-भांति समझ रहा है।

कानूनी अज्ञानता: उत्तर प्रदेश के 5 वर्ष तक मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव जी बाबा धीरेंद्र शास्त्री पर ‘ईशनिंदा’
(Blasphemy) का मुकदमा चलाने की बात कर रहे हैं। उन्हें शायद यह नहीं मालूम कि भारत के संविधान और कानून में
सनातन धर्म के लिए ‘ईशनिंदा’ जैसा कोई कानून अस्तित्व में ही नहीं है।

संसद में सनातन का उपहास: अभी हाल ही में जब पप्पू यादव द्वारा संसद भवन के भीतर सनातन परंपराओं का ड्रामा
(उपहास) किया गया, और अखिलेश जी की धर्मपत्नी उस ड्रामे का मूक हिस्सा बनीं, तब इन नेताओं की आस्था को चोट क्यों
नहीं लगी?

प्रवक्ताओं के सनातन विरोधी जहर पर चुप्पी: समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता (जैसे भाटी और अन्य) जब खुले मंचों से ब्रह्मा,
विष्णु, महेश के अस्तित्व को नकारते हैं, हिंदू देवी-देवताओं का घोर अपमान करते हैं, और उन्हें न पूजने की कसमें खिलाते
हैं, तब अखिलेश यादव जी को ‘ईशनिंदा’ की याद क्यों नहीं आती? तब इन तथाकथित यदुवंशियों का खून क्यों नहीं
खौलता?

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