सुरेन्द्र अग्निहोत्री
लखनऊ: 22 अक्टूबर, 2026
उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय, लखनऊ द्वारा Ancient Bead Manufacturing Techniques: With Special Reference to Harappan Beads विषय पर दिनांक 22 से 23 अक्टूबर 2026 तक दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। कार्यशाला का शुभारंभ आज 22 अक्टूबर 2026 को दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ निदेशक, पुरातत्व निदेशालय, लखनऊ श्रीमती रेनू द्विवेदी, राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित मुख्य प्रशिक्षक एवं प्रस्तर शिल्पकार श्री अनवर हुसैन शेख, खंभात, गुजरात, श्री प्रताप भाई परमार, श्रीमती नीतू अग्रवाल, सहायक आचार्य, अवध बालिका डिग्री कॉलेज तथा श्री राम विनय जी द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।
कार्यक्रम में श्रीमती रेनू द्विवेदी, निदेशक, पुरातत्व निदेशालय, लखनऊ ने कार्यशाला का परिचय देते हुए बताया कि इसका प्रमुख उद्देश्य हड़प्पा सभ्यता में प्रचलित प्राचीन मनका निर्माण तकनीकों का सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक ज्ञान प्रतिभागियों तक पहुँचाना है। उन्होंने कहा कि प्राचीन मनके केवल आभूषण के रूप में प्रयुक्त वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि वे तत्कालीन समाज की तकनीकी दक्षता, कलात्मक अभिरुचि, आर्थिक गतिविधियों, व्यापारिक संपर्कों तथा सांस्कृतिक जीवन के महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक साक्ष्य भी हैं। इनका अध्ययन प्राचीन भारतीय सभ्यताओं की उन्नत शिल्प परंपराओं और तकनीकी उपलब्धियों को समझने में सहायक है।
कार्यशाला के लिए 300 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑनलाइन पंजीकरण कराया, जिनमें से ‘प्रथम आगत, प्रथम स्वागत’ के आधार पर 150 प्रतिभागियों के पंजीकरण स्वीकार किए गए हैं। प्रथम दिवस में प्रतिभागियों को आठ बैचों में प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा, जिससे प्रशिक्षण प्रक्रिया को व्यवस्थित रखते हुए प्रत्येक प्रतिभागी को तकनीकों को समझने और व्यावहारिक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर मिल सके।
कार्यशाला की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें प्रतिभागियों को केवल प्राचीन मनकों के ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक महत्त्व की जानकारी ही नहीं दी जाएगी, बल्कि मनका निर्माण से जुड़ी पारंपरिक शिल्प प्रक्रियाओं को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर भी मिलेगा। खंभात, गुजरात से पधारे राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित मुख्य प्रशिक्षक श्री अनवर हुसैन शेख एवं अन्य अनुभवी शिल्पकारों के मार्गदर्शन में प्रतिभागी प्रस्तर के चयन, मनकों के आकार निर्धारण, घिसाई, परिष्करण तथा छिद्रण जैसी प्रक्रियाओं से परिचित होंगे।
इस प्रकार का प्रशिक्षण प्राचीन शिल्पकारों की तकनीकी दक्षता, धैर्य, सूक्ष्मता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझने में सहायक होगा। विशेष रूप से हड़प्पा सभ्यता के मनका निर्माण की तकनीकों का अध्ययन प्रतिभागियों को यह जानने का अवसर देगा कि सीमित पारंपरिक साधनों के माध्यम से प्राचीन शिल्पकार किस प्रकार सटीक आकार, आकर्षक रूप और उपयोगी संरचना वाले मनकों का निर्माण करते थे।
यह कार्यशाला पुरातत्व के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों तथा शिल्पकला में रुचि रखने वाले प्रतिभागियों के लिए विशेष उपयोगिता रखती है। व्यावहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से प्राचीन मनकों की निर्माण प्रक्रिया को समझने से पुरातात्त्विक अवशेषों के तकनीकी विश्लेषण, उनके निर्माण में प्रयुक्त विधियों की पहचान तथा प्राचीन शिल्प परंपराओं के अध्ययन को प्रोत्साहन मिलेगा।
इसके साथ ही, पारंपरिक शिल्पकारों के अनुभव और कौशल को शैक्षणिक एवं पुरातात्त्विक अध्ययन से जोड़ना इस कार्यशाला का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। इससे पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण, पीढ़ियों के बीच कौशल हस्तांतरण तथा लुप्तप्राय होती शिल्प तकनीकों के संरक्षण की संभावनाएँ सुदृढ़ होंगी। ऐसी पहलें भारतीय सांस्कृतिक विरासत को केवल ऐतिहासिक स्मृति तक सीमित न रखकर उसे व्यावहारिक ज्ञान और जीवंत परंपरा के रूप में आगे बढ़ाने में सहायक हैं।
इस कार्यशाला के माध्यम से प्राचीन भारतीय शिल्प परंपरा के प्रति जागरूकता बढ़ाने, पुरातात्त्विक अध्ययन को व्यावहारिक अनुभव से जोड़ने तथा पारंपरिक शिल्प कौशल के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में सार्थक प्रयास किया जा रहा है। यह आयोजन अतीत की तकनीकी उपलब्धियों को समझने के साथ-साथ उन्हें वर्तमान पीढ़ी तक पहुँचाने और भविष्य के अनुसंधान के लिए नई संभावनाएँ विकसित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है।

