समीक्षक -सुरेन्द्र अग्निहोत्री

30 जून 1857 को लखनऊ के चिनहट-इस्माइलगंज में ऐसा युद्ध हुआ था, जहाँ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सैन्य बलों और फिरंगी अभिमान के प्रतीकों को भारतीय जुनूनी लोगों ने नेस्तनाबूद कर दिया था। उस हार ने भारतीय विद्रोही पक्ष के जुनून को युद्ध के मैदान में बहुत अनुशासित तरीके से फिरंगियों के ऊपर हावी होते देखा था। इस युद्ध की एक विशेष बात यह भी थी कि आखिरी समय तक ब्रिटिश पक्ष के उच्चाधिकारी यह समझ ही नहीं पाए कि चिनहट का युद्ध उनके लिए विजय की नहीं, एक बड़ी पराजय की कहानी लिख देने का प्रारब्ध लिए हुए आया है।
यह राजगोपाल सिंह वर्मा की लिखी किताब है, जिसके लिए उन्होंने इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों का उपयोग किया है। इतिहास के विषयों पर उनकी कई किताबें पिछले वर्षों में हमारी नजरों में आई हैं, और सबने कुछ न कुछ नयापन और नई दृष्टि से अवगत कराने में सफलता प्राप्त की है। “चिनहट 1857: संघर्ष की गौरव गाथा” अभी तक विस्मृत रहे 1857 के एक घटनाक्रम की जरूरी पड़ताल है।
यह युद्ध इतनी अल्प अवधि का था (मात्र कुछ ही घंटों का), कि पूर्वाह्न नौ बजे से लेकर 11 बजे तक ईस्ट इंडिया कंपनी की तोपों, हाथियों, घोड़ों और हथियारों से सज्जित इस सेना के बचे हुए लोग बुरी तरह पराजित होकर रेजीडेंसी की ओर भागने और स्वयं को सुरक्षित करने में लग गए थे। यह उनकी पूर्ण और निर्णायक पराजय थी, पर ईस्ट इंडिया कंपनी के जिम्मेदार लोगों ने इस तथ्य को कभी स्वीकार नहीं किया। दु:खद यह भी है कि भारत के इतिहासकारों और साहित्यकारों ने भी आजादी की इस पहली लड़ाई के घटनाक्रम पर कोई ध्यान ही नहीं दिया, इसलिए आमजन आज भी इस युद्ध से अपरिचित हैं।
चिनहट का युद्ध अचानक नहीं हो गया था। इसके लिए उसी तरह की परिस्थितियों का निर्माण हो रहा था, जैसे 10 मई को मेरठ के विद्रोह के पीछे विकसित हुई घटनाएं जिम्मेदार थीं। अगर सब कुछ ठीक से चलता रहता, तो न कोई क्रांति होती, और न ही लोगों को कोई शिकायत। फिरंगी शासन करते रहते और यहाँ के संसाधनों का दोहन कर हमें अंधेरे युग में धकेलते रहते, पर कहते हैं कि सत्ता भ्रष्ट करती है, और निरंकुश सत्ता पूरी तरह से भ्रष्ट करती है। यह कहावत इन फिरंगियों के ऊपर ठीक बैठती थी। ये हमारे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए आकंठ भ्रष्ट आचरण में डूबने, स्थानीय लोगों के लगातार उत्पीड़न के साथ-साथ यहाँ के निवासियों की भावनाओं के प्रति भी दुस्साहसिक रूप से असंवेदनशील हो चुके थे। ऐसे में चिनहट के रूप में इन्हें अवध के लोगों और उनकी अपनी सेनाओं के स्थानीय सैनिकों के आक्रोश का सामना तो करना ही था। ऐसे में चिनहट के इस युद्ध से पूर्व की परिस्थितियों और उसके बाद के घटनाक्रम को समझना भी जरूरी है। इसीलिए इस पुस्तक में वह विवरण भी दिया गया है जो एकबारगी इस घटनाक्रम से असंबद्ध लगता है, पर वह चिनहट के युद्ध का एक मजबूत कारक रहा है, जिसे समझे बिना इस युद्ध को समझना उचित न होगा।
इस युद्ध से एक बात और महत्त्वपूर्ण रूप से उभर कर आई थी। स्थानीय लोगों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत और संस्कारों के अनुरूप सिद्ध कर दिखाया था कि वे किसी भी आक्रांता के विरुद्ध जी-जान से लड़ने को तैयार हैं, पर मानवीयता उनके मानस का अटूट हिस्सा है, उनके वजूद में आत्मसात है, वे उससे भी पीछे नहीं हटने वाले। यही कारण था कि जब चिनहट के युद्ध में फिरंगियों ने हार के बाद हड़बड़ाहट में रेजीडेंसी की तरफ वापसी की तो लुटी-पिटी अवस्था में, जून की तपती गर्मी में उन भूखे-प्यासे अफसरों और सैनिकों को दूध-पानी पिलाने, उनकी सेवा-सुश्रूषा करने, खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने में आम लोगों ने जो संवेदनशील भावनाएं दिखाईं, वे इन तथाकथित शिक्षित और आधुनिक, परंतु असंवेदनशील कहे जाने वाले फिरंगियों के लिए आँखें खोल देने वाली घटनाएं थीं।
फिरंगियों के खिलाफ धीरे-धीरे लखनऊ ही नहीं, पूरे अवध प्रांत का माहौल कुछ इस तरह से आक्रोशित हो चला था कि यहाँ का हर इन्सान जन भावनाओं के सम्मान में ईस्ट इंडिया कंपनी की सत्ता का विरोध करने को सक्रिय हो चला था। फिर बात राष्ट्रीय गौरव और अस्मिता की भी आ ठहरी थी. शहर और गाँवों के हर किसी वाशिंदे को इस सत्ता से शिकायत थी. मूल बात यह थी कि जन-मानस ने अच्छी तरह समझ लिया था कि ये लोग व्यापारियों के चोले में आये आक्रांता हैं और हम यहाँ के मूल निवासी, इस सांस्कृतिक और सामाजिक धरोहर के संरक्षक! हमारी जमीन और हमारे संसाधनों पर किसी विदेशी शक्ति का प्रभुत्व भला क्यों कायम रहे? चिनहट उसी असंतोष की एक आक्रामक अभिव्यक्ति थी।
लेखक राजगोपाल सिंह वर्मा को बहुत बधाई कि उन्होंने हमारे इतिहास को, हम लोगों के पाठकीय ज्ञान को समृद्ध किया है। 232 पृष्ठ की यह किताब सेतु प्रकाशन, नोयडा से प्रकाशित हुई है। मूल्य रु 325 है।

