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आचार्य संजय तिवारी

पुत्र की आयु, बल और यश के लिए मां का का तप पर्व जीउतिया

सतपुतिया जैसे सात स्वस्थ, आयुवान, बलवान, यशस्वी पुत्रों की कामना के साथ माता की तपस्या का पर्व है जिउतिया। इसीलिए इस व्रत का आधार आहार भी सतपुतिया ही है। भगवान भास्कर की तीक्ष्णतम रश्मियों के साथ आयोजित यह वार्षिक लोक तप पर्व वस्तुतः संतान में प्रकृति की समस्त शक्तियों को आरोपित करने की मातृ तपस्या है। यह न तो यज्ञ है न ही कोई अनुष्ठान। केवल तपस्या है जीवित्पुत्रिका का व्रत।
जीवित्पुत्रिका व्रत में संतान की लंबी उम्र और वंश वृद्धि की कामना के लिए सतपुतिया (तोरई जैसी एक सब्जी) खाई जाती है। सतपुतिया शब्द ‘सत’ (सात) और ‘पुतिया’ (पुत्र या संतान) से मिलकर बना है। यह सब्जी प्रायः सात के समूह या गुच्छों में फलती है। इसे खाने से संतान की संख्या और वंश में वृद्धि होने की पौराणिक मान्यता जुड़ी है।
सतपुतिया सब्जी का सीधा संबंध जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत से है, जिसके बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है। जितिया व्रत और सतपुतिया के धार्मिक महत्व के पीछे तीन प्रमुख पौराणिक व लोक कथाएं प्रचलित हैं, जिन्हें व्रत के दिन माताएं जरूर सुनती हैं:

चील और सियारिन की लोक कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नर्मदा नदी के किनारे एक जंगल में एक चील और एक सियारिन रहती थीं, जो आपस में गहरी सहेलियां थीं। एक बार उन्होंने गांव की महिलाओं को संतान की लंबी आयु के लिए जितिया का निर्जला व्रत करते देखा और खुद भी यह व्रत रखने का संकल्प लिया। व्रत के दिन सियारिन को बहुत तेज भूख लगी। वह भूख बर्दाश्त नहीं कर पाई और रात में चुपके से श्मशान जाकर हड्डियां और मांस खा लिया, जिससे उसका व्रत खंडित हो गया। दूसरी ओर, चील ने पूरी निष्ठा और भूख-प्यास सहकर नियमपूर्वक व्रत पूरा किया।

अगला जन्म:

अगले जन्म में दोनों सहेलियां मनुष्य रूप में सगी बहनें बनकर राजा के घर जन्मीं। बड़ी बहन (पूर्व जन्म की सियारिन) का विवाह एक मंत्री से हुआ, जबकि छोटी बहन (पूर्व जन्म की चील) रानी बनी।
व्रत का प्रभाव: पिछले जन्म में व्रत तोड़ने के कारण बड़ी बहन (सियारिन) के बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे, जबकि छोटी बहन (चील) के सात पुत्र हुए जो बहुत वीर और दीर्घायु थे। बड़ी बहन ने जलन के कारण कई बार रानी के बच्चों को मारने की कोशिश की, लेकिन व्रत के पुण्य प्रभाव से बच्चों का बाल भी बांका नहीं हुआ। बाद में जब उसे अपनी भूल का अहसास हुआ, तो उसने भी पश्चाताप कर पूरी निष्ठा से यह व्रत किया और उसे संतान सुख मिला।

राजा जीमूतवाहन की पौराणिक कथा

यह कथा गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन से जुड़ी है। वे बहुत दयालु और परोपकारी थे। एक बार जीमूतवाहन जंगल से गुजर रहे थे, तो उन्होंने एक वृद्धा (नागमाता) को रोते हुए देखा। पूछने पर पता चला कि नागों और पक्षीराज गरुड़ के बीच एक समझौता हुआ है, जिसके तहत गरुड़ को हर रोज एक नाग आहार के रूप में सौंपा जाता है। उस दिन वृद्धा के इकलौते पुत्र ‘शंखचूड़’ की बारी थी। नागमाता का दुख देखकर जीमूतवाहन ने उनके पुत्र के प्राण बचाने का निर्णय लिया। वे खुद लाल कपड़े में लिपटकर वध-शिला पर लेट गए। जब गरुड़ आए, तो वे जीमूतवाहन को उठाकर ले गए और उन्हें खाने लगे। गरुड़ ने देखा कि उनके खाने पर भी यह जीव रोने या चिल्लाने के बजाय मुस्कुरा रहा है। गरुड़ ने आश्चर्यचकित होकर उनका परिचय पूछा। जीमूतवाहन की वीरता और त्याग से प्रसन्न होकर गरुड़ ने न केवल उनके प्राण छोड़ दिए, बल्कि भविष्य में किसी भी नाग की बलि न लेने का वचन दिया। साथ ही, उन्होंने वरदान दिया कि जो भी माता इस दिन संतान की रक्षा के लिए व्रत करेगी, उसकी संतान दीर्घायु होगी।

महाभारत काल और भगवान कृष्ण की कथा

जितिया व्रत की एक कथा द्वापर युग से भी जुड़ती है। महाभारत युद्ध के अंत में गुरु द्रोणाचार्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर पर हमला कर दिया और धोखे से द्रौपदी के पांचों पुत्रों का वध कर दिया। इसके बाद अर्जुन ने अश्वत्थामा को बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि छीन ली। क्रोधित अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को समूल नष्ट करने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र चला दिया।उत्तरा का गर्भ नष्ट हो गया और बच्चा मृत पैदा हुआ। तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उस मृत बालक को देकर उसे दोबारा जीवित कर दिया। गर्भ में मरकर दोबारा जीवित होने के कारण उस बालक का नाम जीवित्पुत्रिका (आगे चलकर राजा परीक्षित) रखा गया। माना जाता है कि तभी से माताओं द्वारा संतान की सुरक्षा के लिए जीवित्पुत्रिका या जितिया का व्रत रखने की शुरुआत हुई।

सतपुतिया का विशेष महत्व

जितिया व्रत के पहले दिन ‘नहाय-खाय’ पर सतपुतिया (सरपुतिया) की सब्जी खाने का विधान इन कथाओं के संदेश से जुड़ा है। सतपुतिया के फल हमेशा गुच्छों में एक साथ उगते हैं (एक ही डाल पर 5 से 7 फल)। लोक परंपराओं में यह गुच्छा वंश वृद्धि और संतान की लंबी आयु का प्रतीक माना जाता है। माताएं भगवान जीमूतवाहन से प्रार्थना करती हैं कि जैसे सतपुतिया के फल हमेशा गुच्छों में लहलहाते हैं, वैसे ही उनका परिवार और संतान भी हमेशा सुरक्षित, फलते-फूलते और दीर्घायु रहें। 36 घंटे के निर्जला उपवास के बाद पेट को हल्के और सुपाच्य भोजन की जरूरत होती है, जिसमें यह बेहद फायदेमंद है। इसमें प्रचुर मात्रा में पानी, फाइबर, आयरन और विटामिन पाए जाते हैं जो शरीर को तुरंत ऊर्जा देते हैं।

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