विदर्भ कुमार

उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय, लखनऊ द्वारा छतर मंजिल परिसर में आयोजित ‘प्राचीन मनका निर्माण की तकनीक: हड़प्पाकालीन मनकों के विशेष संदर्भ में’ विषयक द्विदिवसीय कार्यशाला का आज समापन हुआ। इस कार्यशाला का उद्देश्य प्राचीन मनका निर्माण की पारंपरिक तकनीकों का प्रायोगिक प्रशिक्षण प्रदान करना तथा विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को भारत की समृद्ध पुरातात्त्विक एवं शिल्प परंपराओं से परिचित कराना था।
कार्यशाला के लिए 300 से अधिक प्रतिभागियों ने ऑनलाइन पंजीकरण कराया। उपलब्ध प्रशिक्षण सुविधाओं एवं निर्धारित क्षमता के दृष्टिगत ‘प्रथम आगत, प्रथम स्वागत’ के आधार पर 150 प्रतिभागियों का पंजीकरण स्वीकार किया गया। प्रतिभागियों की उत्साहपूर्ण सहभागिता प्राचीन शिल्प परंपराओं एवं पुरातात्त्विक तकनीकों के प्रति बढ़ती रुचि को दर्शाती है।
कार्यशाला के द्वितीय दिवस पर प्रतिभागियों को मनका निर्माण की ग्राइंडिंग (घर्षण द्वारा आकार देना) एवं पॉलिशिंग (सतह को चिकना एवं चमकदार बनाना) तकनीकों का प्रायोगिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया। प्रशिक्षक श्री अनवर हुसैन शेख, श्री आफताब हुसैन शेख एवं श्री प्रताप भाई माथुर भाई परमार ने इन तकनीकों का व्यावहारिक प्रदर्शन करते हुए मनकों के निर्माण में प्रयुक्त पारंपरिक विधियों एवं उनकी तकनीकी विशेषताओं की जानकारी दी। शोधार्थियों एवं छात्र-छात्राओं ने स्वयं इन प्रक्रियाओं में भाग लेकर प्राचीन मनका निर्माण की तकनीकी बारीकियों को प्रत्यक्ष रूप से समझा।
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को सैद्धांतिक जानकारी के साथ व्यावहारिक अनुभव प्रदान करने पर विशेष बल दिया गया। इस प्रकार के प्रशिक्षण से प्राचीन मनकों के निर्माण, उनके आकार निर्धारण, सतह परिष्करण तथा तत्कालीन शिल्पकारों के तकनीकी कौशल को समझने में सहायता मिलती है। साथ ही, यह पहल पुरातत्त्व के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए प्रायोगिक अध्ययन के नए अवसर उपलब्ध कराती है।

समापन सत्र में प्रतिभागियों ने कार्यशाला के दौरान प्राप्त अपने अनुभवों, विचारों एवं सीख को साझा किया। उन्होंने प्रशिक्षण को ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी बताते हुए प्राचीन भारतीय शिल्प परंपराओं और पारंपरिक तकनीकी ज्ञान को समझने में इस प्रकार के आयोजनों की महत्ता पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्त्व निदेशालय के उत्खनन एवं अन्वेषण अधिकारी श्री रामविनय तथा संस्कृति विभाग के अनु सचिव श्री मनोज कुमार ने प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए। कार्यक्रम का संचालन श्री बलिहारी सेठ ने किया।
इस अवसर पर विभागीय अधिकारी एवं कार्मिक श्री गौरव गुप्ता, श्री राहुल कुमार त्यागी, श्री राहुल कुमार बरैया, श्री अभयराज सिंह, श्री संतोष कुमार सिंह, श्री आशीष, श्री अभिषेक कुमार (प्रथम एवं द्वितीय), श्री दरियाब, श्री हिमांशु एवं श्री निर्भय सहित अन्य अधिकारी-कर्मचारी, कार्यशाला के प्रशिक्षक तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।
यह द्विदिवसीय कार्यशाला प्राचीन भारतीय शिल्प परंपराओं के व्यावहारिक अध्ययन, पारंपरिक तकनीकी ज्ञान के संरक्षण तथा विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों में पुरातात्त्विक विरासत के प्रति रुचि विकसित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल सिद्ध हुई। इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम पुरातात्त्विक अध्ययन को अधिक व्यावहारिक एवं अनुभवपरक बनाने तथा भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाने में सहायक हैं।

