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डॉ रविशंकर पांडेय 

बुंदेलखंड के प्रसिद्ध लोक महाकाव्य ‘आल्हा खंड’ की एक बेहद लोकप्रिय औ जानी-मानी पंक्ति है— ‘किला कालिंजर जग में जहिर, जाहिर पान महोबे क्यार’। इ पंक्ति उत्तर प्रदेश के महोबा जिला के विश्व प्रसिद्ध देशावरी पान के ऐतिहासिक महत्व औ ओकी पहिचान को बताउ है। महोबा को पान, जेको देशावरी पान कहे जात है, अपने अनूठे स्वाद, सुगंध औ औषधीय गुनन के मारे सदियन से प्रसिद्ध चलो आ रहो है। मुगल काल के ऐतिहासिक ग्रंथ ‘आइने अकबरी’ में भी महोबा के पान को उल्लेख मिल जात है। इ ऐतिहासिक औ पारंपरिक देशावरी पान को भारत सरकार द्वारा जीआई टैग (GI Tag) भी दी जा चुका है, जो ओकै विशिष्ट स्थान औ गुणवत्ता को प्रमाणित करत है। बुंदेलखंड की संस्कृति में आल्हा को गान औ महोबा को पान इहाँ की आन, बान औ शान को प्रतीक माने जात है।

महोबा जिला औ ओकै आसपास के इलाका में दसवीं शताब्दी से देशावरी पान की खेती होत चली आ रही है। इ क्षेत्र में पान की खेती की शुरुआत करने को श्रेय चंदेल राजाउन को जात है, बहीं बाद में इ खेती को मुगल शासकन ने भी संरक्षण प्रदान कियो छौ। चंदेलन के शासनकाल में तालाबन के किनारन पर पान के बरेजे बनाए जात छ्ते। पै अब महोबा में पान की खेती सिकुड़ती चली जा रही है।

पान केवल बुंदेलखंड से ही नईं, बल्कि संपूर्ण भारत के इतिहास औ परंपराउन से जुड़ो हुओ है। पान को अलग-अलग भाषाउन में अलग-अलग नाम से जानो जात है, जैसे संस्कृत में तांबूल, तेलुगु में पक्कू, तमिल औ मलयालम में बैटिलाइ औ गुजराती में नागर बेल। पान की उत्पत्ति को लेकर भिन्न-भिन्न कथाएं पढ़ने औ सुनने को मिलती हैं। तथापि कहो जात है कि पान की बेल नागलोक से प्राप्त भई है। कहत हैं कि नागलोक के राजा वासुकि ने अपनी कन्या के विवाहोत्सव में दहेज के रूप में नागबेल दी थी। एक अन्य कथा के अनुसार जब पृथ्वीलोक पर ब्रह्मा जी ने यज्ञ प्रारंभ कियो तब देवपूजनार्थ पान की आवश्यकता पड़ी। पान पाताल में नागों के पास छ्ते। बृहस्पति अपने तपोबल, मनोबल औ बुद्धिचातुर्य से नागदेव से पान की बेल लाए औ नागलोक से पान के रक्षार्थ तक्षक, डेढ़ादेव औ जाखदेव आदि भेजे गए। आज भी बरेजों पर इनकी वार्षिक पूजा नागपंचमी के दिन करने की लोक प्रथा पान कृषकों के बीच चली आ रही है।

पान को संस्कृत में ताम्बूल कहत हैं औ इ संपूर्ण भारत में हमारे खान-पान, अतिथि सत्कार के साथ-साथ पूजा-पाठ औ भारतीय संस्कारों को अभिन्न अंग बन के चलो आ रहो है। इतो ही नईं, ‘ताम्बूलम समर्पयामि’ के बार-बार उच्चारण द्वारा भारतीय कर्मकांड को अभिन्न हिस्सा बन के पान आज भी सर्वत्र महिमामंडित हो रओ है। वैज्ञानिक के मतानुसार पान मध्य तथा पूर्वी मलेशिया की मूल की प्रजाति है। वैज्ञानिकन के अनुसार भारत में सर्वप्रथम आसाम के जगलन में वृक्षों पर लता के रूप में देख्यो गयो, बाद में ओकी पहचान पान के रूप में की गई।

पै महोबा में चंदेल नरेशान ने पान की बेल राजस्थान के उदयपुर-बासवाड़ा से इहाँ मँगाई थी औ गोरखगिरी के पश्चिमी क्षेत्र में रोपित कराई थी। बहाँ आज भी नागौरिया को मंदिर स्थित है। बुंदेलखंड में पछुआ औ दक्षिणी हवाएं कछु ज्यादा ही गरम होत हैं, अस्तु पान के बरेजे भी मदनसागर, कीरत सागर औ अन्य सरोवरों के किनारे-किनारे लगाने की प्रक्रिया प्रारंभ भई ताकि गरम हवाउन से ओकी रक्षा की जा सके औ सिंचाई हेतू पर्याप्त जल की उपलब्धता सुनिश्चित बनी रहे।

महोबा में पान को खान-पान, अतिथि सत्कार तथा पूजा सामग्री के साथ-साथ युद्ध संस्कृति से भी चोली-दामन को साथ रओ है। महोबा में इ एक आम रिवाज रओ है कि जब किसी से युद्ध करना हो औ युद्ध की भयंकरता विशिष्ट हो तब चाँदी के थाल में पान लगा के राख्यो जात छौ। ओने बीरा कहत छ्ते औ बह पान को बीरा बीरन के लिए चुनौती के रूप में आवत छौ। तब कोई वीर शिरोमणि ही ओने सबके समक्ष लेके अपने मुँह में रख के अपने वीरोचित गुणान को सबके सामने प्रकट कर मोर्चा लेने की मानो स्वीकृति देत छौ। इ प्रकार युद्ध को सेनापतित्व पान को बीरा लेके सुनिश्चित करने की सुदीर्घ परंपरा रही है।

महोबा को पान औ पान को बीड़ा: शौर्य औ संस्कृति को एक हजार साल को स्वाद

बुंदेलखंड में आज भी एक कहावत है— “महोबा को पान औ बाप को मान, कभी नईं भूलना चाहिए।” इ सिर्फ एक कृषि उत्पाद नईं, बल्कि महोबा की पहिचान है। महोबा के पान को इतिहास महोबा कस्बा के इतिहास से जुड़ो हुओ है औ इ लगभग 831 ईस्वी में चंदेल वंश की स्थापना से शुरू होत है। जनश्रुति है कि इहाँ चंद्रवर्मन ने महोत्सव कियो छौ, एई से ओको प्राचीन नाम महोत्सव कस्बा पड़ो, जो बाद में महोबा हो गयो। 10वीं से 16वीं शताब्दी तक इ चंदेलन की राजधानी रओ। इहाँ के राजा परमालदेव के दो सामंत छ्ते—वीर आल्हा औ ऊदल। ओकें युद्ध को वर्णन परमाल रासो औ आल्ह-खंड में मिल जात है।

महोबा के पान की प्रसिद्धि इतनी थी कि मुगल काल में भी इ शाही महत्त्व को छौ। आइने-अकबरी के अनुसार महोबा क्षेत्र 82000 बीघा में फैलो छौ औ मुगल दरबार को 40 लाख रुपया से अधिक के राजस्व के अलावा 12000 पान के पत्ते बतौर लगान भेजत छौ। महोबा को देशावरी पान अपनी खास मिठास औ कुरकुरेपन (crispiness) के लिए देश-विदेश में मशहूर है। ओको स्वाद तीखा-मीठा, असरदार औ मुँह में जाते ही घुल जाने वालो माने जात है। ओकी अनूठी खूबियन के कारण भारत सरकार ने 2021 में ओने जीआई टैग (GI Tag) प्रदान कियो।

बरेजा औ बरई: इहाँ पान के खेतन को ‘बरेजा’ औ खेती करने बालन को ‘बरई’ कहो जात है। बरेजा बाँस औ पुआल से बनो एक अंधेरो, नमो घर होत है जहाँ पान को धूप से बचा के उगानो जात है—इ भी एक सांस्कृतिक विरासत है।

पान को बीड़ा—शौर्य, प्रेम औ अतिथि सत्कार को प्रतीक: महोबा के पान को बीड़ा तीन रूपन में आज भी समूचे बुंदेलखंड में जीवित है:

·          शौर्य को बीड़ा: बुंदेलखंड की सबसे प्रसिद्ध परंपरा। “किसी संग्राम में जाते वक्त योद्धा पान को बीड़ा उठा के संदेश देत छ्ते।” आल्हा-ऊदल के समय युद्ध को आह्वान पान को बीड़ा उठा के ही किया जात छौ। जो बीड़ा उठाउ छौ, वही युद्ध की जिम्मेदारी लेउ छौ। आज भी कजली मेला में इ पराक्रम को याद कियो जात है।

·          अतिथि सत्कार को बीड़ा: महोबा में कहो जात है— “मेहमान नवाजी में मान देने के लिए पान न हो, तो आतिथ्य कमजोर दिखत है। इहाँ के पान दुनिया भर में मशहूर हैं।” शादी, दशहरा, दीपावली में पान को बीड़ा दे के अभिवादन करने की परंपरा आज भी है, जैसे बुंदेलखंड में दशहरे पर एक-दूसरे को पान को पत्ता दे के शुभकामना दी जात है।

·          मंगल औ भक्ति को बीड़ा: खाने के बाद पान खाने को चलन लगभग इहाँ से शुरू हुओ माने जात है। पूजा में, अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा में भी महोबा के देशावरी पान को उपयोग पूजा के लिए कियो गयो। बीड़े में कत्था, चूना, सुपारी, गुलकंद, लौंग, इलायची के साथ बारीक कटो हुओ देशावरी पत्तो लपेटो जात है, इ स्वाद ही नईं, पाचन औ सम्मान को संगम है।

महोबा को पान केवल लबों की शान ही नईं, इ तो इहाँ की शान-ओ-शौकत से जुड़ो रओ है। पान जो गिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाए बहीं महोबा को करारो देशावरी पान है। इ बेहद स्वादिष्ट होत है। ओको ख्याल आते ही सबके मुँह में पानी आ जात है। शास्त्रन में तो इहाँ तक कहो गयो है कि पान के अग्रभाग में आयु, मूल अर्थात डंठल में यशकीर्ति, मध्य भाग में लक्ष्मी को निवास है। कारण चाहे जो हो मगर पान खाने वाले या पान लगा के बेचने वाले पान के पत्ते को डंठल, नोंक तथा मध्य भाग की मोटी नस निकाल के, धो के औ पोंछ के कत्था, चूना, सुपारी के साथ लगा के देत हैं जिसे पान को बीड़ा कहो जात है। कहत हैं कि पान की एक दर्जन जातियाँ तथा 300 प्रजातियाँ होत हैं किंतु वैज्ञानिक दृष्टि से 5 या 6 किस्में होत हैं।

महोबा को पान केवल पत्ता नईं है। बह चंदेलन की महोत्सव-नगरी की गंध है, आल्हा-ऊदल के बीड़े की चुनौती है, औ बुंदेलखंड के बरई की हथेली की मेहनत है। एक बीड़ा मुँह में रखना, हजार साल को इतिहास चबाना है।

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